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बस आज का दिन और फिर सिंगापुर में होगी ट्रंप-किम की ऐतिहासिक बैठक

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के प्रमुख किम जोंग उनके बीच 12 जून को होने वाली वार्ता को लेकर लगभग सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। पूरी दुनिया सिंगापुर में होने वाली इस अभूतपूर्व वार्ता पर नजरें जमाए बैठी है। इसकी वजह काफी हद तक साफ है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि यदि यह वार्ता सफल हो जाती है तो दूसरे देश उत्तर कोरिया से खुलकर व्‍यापार कर सकेंगे और वहां पर निवेश की प्रक्रिया भी शुरू कर सकेंगे। इस वार्ता को लेकर जहां तक किम जोंग उन का ताल्‍लुक है तो वह अपनी चाल चल चुके हैं। अब इस वार्ता की सफलता का दारोमदार पूरी तरह से ट्रंप पर है। यहां आपको बता दें कि ट्रंप और किम के बीच यह वार्ता सिंगापुर में सेंटोसा के रिसॉर्ट आइलैंड स्थित कैपेला होटल में 12 जून सुबह नौ बजे होनी है। इस वार्ता में अमेरिका के जाने-माने बास्‍केटबॉल प्‍लेयर डेनिस रोडमैन के जाने की भी चर्चा काफी जोरों पर है। डेनिस किम के चहेते प्‍लेयर हैं और वह उत्तर कोरिया भी जा चुके हैं।

किम की रणनीति में बड़े बदलाव

किम की चाल और ट्रंप पर दारोमदार से पहले सिंगापुर वार्ता से पहले और बाद की घटनाओं पर निगाह डालना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष सितंबर में जब उत्तर कोरिया ने परमाणु परिक्षण कर खुद को परमाणु शक्ति संपन्‍न राष्‍ट्र घोषित किया था, किया था, उस वक्‍त अमेरिका की तरफ से काफी तीखी बयानबाजी की गई थी। लेकिन इसके बाद किम ने अपनी रणनीति में दो बड़े बदलाव किए। इसमें पहला बड़ा बदलाव कोई और परमाणु परिक्षण न करने का था तो दूसरा बदलाव विंटर ओलंपिक में अपनी टीम भेजने का था। इन दोनों बदलावों ने अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर न सिर्फ किम की छवि बदलने का काम किया बल्कि उसको दक्षिण कोरिया को करीब लाने में भी सफल रहा। यहीं से सिंगापुर वार्ता की राह भी शुरू हुई थी।

ट्रंप से वार्ता की हामी

विंटर ओलंपिक के बाद ही दक्षिण और उत्तर कोरिया के बीच वार्ताओं का दौर शुरू हुआ और यह भी तय हुआ कि यहां पर शांति स्‍थापित की जानी चाहिए। दक्षिण कोरिया की बदौलत किम और ट्रंप की बैठक भी तय हो सकी। यहां पर किम ने अपनी रणनीति में दो और बदलाव किए। ये बदलाव ट्रंप से वार्ता के लिए हामी भरने और उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार मुक्‍त करने का था। किम के इन चार रणनीतिक बदलावों ने अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर उनकी छवि को कुछ ऐसे पेश किया कि वे न सिर्फ ट्रंप से वार्ता के लिए तैयार हैं बल्कि कोरियाई प्रायद्वीप में शांति स्‍थापित करने को भी प्रतिबद्ध हैं। हालांकि इस दौरान कुछ मौके ऐसे भी आए जब किम की तरफ से कुछ समय के लिए तीखी बयानबाजी की गई थी। लेकिन यह मौके गिने-चुने ही थे।

 

रणनीतिक तौर पर तैयार किम

सिंगापुर वार्ता के लिए जहां अब किम जोंग उन मानसिक और रणनीतिक तौर पर पूरी तरह से तैयार दिखाई दे रहे हैं। इस वार्ता को अंजाम तक पहुंचाने से पहले उन्‍होंने अपने सबसे करीबी देश चीन के राष्‍ट्रपति से इस बाबत दो बार वार्ता भी की है। जानकार मानते हैं कि इस वार्ता में भले ही चीन की भूमिका सामने से कम है लेकिन पर्दे के पीछे चीन बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। आपको बता दें कि व्‍यापारिक तौर पर चीन उत्तर कोरिया में सबसे अहम भूमिका में है। उत्तर कोरिया की जरूरत का 90 फीसद कारोबार सिर्फ चीन ही पूरा करता है। इस लिहाज से भी यहां पर चीन की भूमिका काफी अहम हो जाती है। ऑब्‍जरवर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत यह भी मानते हैं कि उत्तर कोरिया इस वार्ता में चीन को तरजीह दे सकता है। उनका यह भी कहना है कि क्‍योंकि उत्तर कोरिया का सबसे करीबी देश चीन ही है इसलिए वह चीन को इस वार्ता में शामिल होने की बात कर सकता है। हालांकि इसके लिए अमेरिका तैयार नहीं होगा।

 

शी के अलावा असद से भी की मुलाकात

बहरहाल, सिंगापुर वार्ता तय होने के बाद से किम शी चिनफिंग के अलावा रूसी विदेश मंत्री से भी मिल चुके हैं। रूस के विदेश मंत्री ने किम को रूस आने का भी न्‍योता दिया है। इसके अलावा वह आने वाले दिनों में सीरिया के राष्‍ट्रपति बशर अल असद समेत रूसी राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात कर सकते हैं। सिंगापुर वार्ता के इर्द-गिर्द घूमने वाला यह घटनाक्रम बेहद खास माना जा रहा है। दक्षिण कोरिया के राष्‍ट्रपति मून जे के साथ किम ने बीते माह जिस गर्म जोशी से मुलाकात की थी उससे यह बात बेहद साफ हो गई है कि वह इस वार्ता को लेकर अपनी तैयारी पूरी कर चुके हैं। अब इस वार्ता की सफलता का दायित्‍व ट्रंप पर अपेक्षाकृत ज्‍यादा है। इस वार्ता से पूर्व जो बातें निकलकर सामने आई हैं उनमें यह भी है कि किम इस वार्ता में अपनी सुरक्षा की गारंटी, अमेरिकी प्रतिबंधों से मुक्ति और अंतरराष्‍ट्रीय व्‍यापार से जुड़ी मांगों को रखने में नहीं हिचकिचाएगा। अंतरराष्‍ट्रीय पत्रकारों की मौजूदगी में अपनी परमाणु साइट हो नष्‍ट कर किम यह जता चुके हैं कि उनकी तरफ से शांति के कदम आगे बढ़ाए जा चुके हैं, अब गेंद अमेरिका के पाले में है।

 खराब आर्थिक हालात

बार ट्रंप के ऊपर दारोमदार की बात यहां पर इसलिए भी की जा रही है क्‍योंकि उत्तर कोरिया के मौजूदा आर्थिक हालात आज किसी से नहीं छिपे हैं। यह एक और बात बेहद खास है। वह ये है कि कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिका की तरफ से यहां तक कहा गया है कि किम सिंगापुर के होटल का खर्च उठाने के लायक भी नहीं हैं। इसके अलावा ये भी कहा गया है कि किम के पास ऐसा विमान नहीं है जिससे वह सीधे सिंगापुर पहुंच जाएं। इसके लिए वह पहले बीजिंग जाएंगे और वहां से सिंगापुर पहुंचेंगे। यह सबकुछ आर्थिक रूप से कंगाल रहे उत्तर कोरिया की तस्‍वीर को दिखाता है। ऐसे में किम की बेहतर छवि से भी ट्रंप के ऊपर इस वार्ता को सफल बनाने का दबाव कुछ ज्‍यादा ही होगा। मौजूदा समय में जहां कुछ मुद्दों पर अमेरिका कई देशों के लिए खलनायक बन चुका है वहीं उत्तर कोरिया की स्थिति इस मामले में पहले से बेहतर हुई है। उत्तर कोरिया से जुड़े सभी मुद्दों का शांतिपूर्ण हल तलाशने के लिए कई देशों ने किम की पहल का स्‍वागत किया है। यही वजह है कि यदि सिंगापुर वार्ता विफल रही तो इसका काफी कुछ कारण ट्रंप को ही बताया जाएगा। ऐसा इसलिए भी है क्‍योंकि अमेरिका की तरफ से उत्तर कोरिया को लेकर लगातार तीखी बयानबाजी हो रही है। ऐसे में इस वार्ता की विफलता से विश्‍व समुदाय में अमेरिका को लेकर गलत मैसेज जाएगा।

 किम के पक्ष में सहानुभूति 

यह काफी हद तक माना जा रहा है कि मौजूदा समय में किम के पक्ष में सहानुभूति की लहर है। ऐसे में यदि उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों में ढिलाई नहीं बरती गई या फिर यह वार्ता किसी भी मुद्दे पर विफल हो गई तो इसका आरोप अमेरिका के ऊपर लगना तय है। मुमकिन यह भी है कि जिस तरह से ईरान के मुद्दे पर कुछ देशों ने अमेरिका को अलग-थलग कर दिया है ठीक वैसे ही यहां पर भी अमेरिका को अलग कर दिया जाएगा। यह अमेरिका और ट्रंप की छवि के लिए अच्‍छा नहीं होगा। दरअसल, जानकार ये मानते हैं कि उत्तर कोरिया को लेकर अमेरिका के पास में कोई तय नीति नहीं है। खुद प्रोफेसर पंत का कहना है कि एक झटके में ट्रंप वार्ता के लिए हामी भर देते हैं और एक ही पल में इससे पीछे भी हट जाते हैं। ऐसा ही ईरान के मुद्दे पर हुआ था। लेकिन ट्रंप के फैसले को कई देशों ने सिरे से खारिज कर दिया था और ईरान के पक्ष में अपना फैसला सुनाया था। सिंगापुर में भी यदि वार्ता विफल होती है तो ऐसा ही कुछ देखने को मिल सकता है

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