4 लाख की आबादी और 10 साल पुराने लोकतंत्र वाला मालदीव आखिर क्यों जरूरी है भारत के लिए

4 लाख की आबादी और 10 साल पुराने लोकतंत्र वाला मालदीव आखिर क्यों जरूरी है भारत के लिए

 हिंद महासागर में एक छोटा से द्वीप के रूप में मौजूद मालदीव भौगोलिक रूप से भले छोटा हो, लेकिन सामरिक दृष्टि से ये देश हमेशा से भारत के लिए खास रहा है. यहां तक कि 2008 से पहले जब यहां लोकतंत्र नहीं था, उस समय भी भारत और इस देश के बीच संबंध इतने खराब नहीं हुए, जितने अब्दुल्ला यमीन के शासन काल में हुए. चीन समर्थक माने जाने वाले अब्दुल्ला यमीन ने एक एक कर भारत से संबंध तोड़ने की चालें चलीं. इसके बरक्स उन्होंने चीन के करीब जाने के लिए हर संभव कोशिश की. हिंद महासागर में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिशों में जुटा चीन हर देश में अपनी सामरिक शक्ति बढ़ा रहा है. इसी लिए वह हर देश में भारी मात्रा में निवेश कर रहा है. जब से चीन मालदीव के करीब आया, तभी से भारत से उसके संबंध बिगड़े.

इसीलिए रविवार को राष्ट्रपति के लिए हुए चुनावों पर भारत की नजर सबसे ज्यादा थी. उम्मीद नहीं थी कि अब्दुल्ला यमीन को हार मिलेगी, क्योंकि उनका कब्जा सभी संस्थाओं पर था. इस बार के चुनावों में 4 लाख की आबादी वाले देश में ढाई लाख से ज़्यादा लोगों ने वोट दिए. रविवार को हुए मतदान में श्रीलंका और मलेशिया में भी मतदान केंद्र बनाए गए थे. इन चुनावों में अब्दुल्ला यमीन के खिलाफ पूरे विपक्ष ने एक संयुक्त उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को बनाया. पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद इस समय श्रीलंका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं.

उन्हें 2013 में यमीन के सत्ता में आने के बाद से देश छोड़ना पड़ा था. यमीन यहीं नहीं रुके, उन्होंने ऐसे कानून बनाए जिनसे विपक्षी नेता या तो जेल में डाल दिए गए या उन्हें देश छोड़ना पड़ा. इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों को गिरफ्तार कर लिया गया था. मालदीव 1966 में ब्रिटेन से आजाद हुआ तभी से भारत के साथ उसके मजबूत रिश्ते कायम हैं.

जब यमीन ने लगाया आपातकाल भारत से बिगड़े संबंध
जब अब्दुल्ला यमीन ने मालदीव में आपातकाल का ऐलान किया, उस समय भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था. इतना ही नहीं पूर्व राष्ट्रपति नौशीद ने भारत से यहां हस्तक्षेप का आग्रह भी किया था. अभी हाल में दोनों देशों के बीच तल्खी इतनी बढ़ी कि मालदीव ने भारत के दिए दो हेलिकॉप्टरों को वापस ले जाने के लिए कह दिया. इसके साथ ही यामीन ने भारतीय कंपनियों को कई प्रोजेक्टों के दिए कॉन्ट्रैक्ट को भी वापस ले लिया था.

भारत के लिए क्या हैं मायने…
मालदीव की पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटन पर टिकी है. लेकिन ये हिंद महासागर में ऐसी जगह स्थित है, जहां से भारत तक पहुंच बहुत आसान है. इसलिए ये देश भारत के लिए हमेशा से अहम रहा है. ऐसे में इस देश में चीन की घुसपैठ भारत के लिए चिंता का सबब है. अब्दुल्ला यामीन के कार्यकाल में चीन से यहां भारी मात्रा में निवेश हुआ है. मालदीव और चीन की दोस्ती भारत के लिए झटके की तरह है. भारत की चिंता दो बातों ने बढ़ाई. एक मालदीव में चीन की मौजूदगी तेजी से बढ़ी. दूसरी, देश में लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ. मालदीव जहां स्थित है वो भारत के लिए बहुत अहमियत रखता है. मालदीव के पास से गुजरने वाले समुद्री रास्ते से भारत तेल लाता है.

कहा जा रहा है कि चीन ने श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे के रहते जो किया वही काम यामीन के कार्यकाल में चीन ने मालदीव में किया. मालदीव को सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश चीन से मिल रहा है. यहां तक कि मालदीव की कंपनियों ने अपने विज्ञापन में कह दिया कि भारतीय नौकरी के लिए आवेदन नहीं करें, क्योंकि उन्हें वर्क वीज़ा नहीं मिलेगा.

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