श्रीलंका में सियासी संकट, क्या ये भारत के लिए है बुरी खबर

श्रीलंका में सियासी संकट, क्या ये भारत के लिए है बुरी खबर

श्रीलंका के राष्ट्रपति मैथ्रिपाला सिरिसेना ने बीते शुक्रवार को वहां के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई. इसके बाद से वहां सियासी संकट गहराया है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि रविवार को मंत्री अर्जुन रणतुंगा को अगवा करने की कोशिश हुई, जिसेक बाद उनके बॉडीगार्ड ने फायरिंग की. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें एक व्यक्ति की मौत भी हो गई.

श्रीलंका में हो रहे मौजूदा घटनाक्रम को दखें तो इसपर भारत और चीन दोनों नजर बनाए हुए हैं. जहां चीन वहां कई बिलियन डॉलर इन्वेस्ट करके एक मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया हुआ है, वहीं वह उसी के जरिए मालदीव को भी साधना चाहता है. हालात यहां तक हैं कि श्रीलंका में आरोप लग रहे हैं कि वहां नेताओं की खरीद फरोक्त में चीन का हाथ है. हालांकि, चीनी राजदूर से इससे साफ तौर पर इनकार कर दिया है. दूसरी तरफ भारत वहां की लोकतांत्रिक और संवैधानिक स्थिरता को लेकर चिंतित है. साथ ही वह दक्षिण ध्रुव में चिंता की सबब बन रहे चीन की हरकतों को भी ध्यानमें रख रहा है.

कौन कितना ताकतवर
भारत के विपरीत श्रीलंका में राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री से ज्यादा राजनैतिक शक्ति होता है. प्रधानमंत्री राष्ट्रपति का डेप्युटी और कैबिनेट का नेता होता है. राजपक्षे और सिरिसेना एक साथ मिलकर सिर्फ 95 सीट ही रखे हुए हैं जो कि बहुमत से कम है. दूसरी तरफ देखें तो विक्रमसिंघे की पार्टी के पास 106 सीट है और वह बहुमत से सिर्फ 7 सीट कम है.

पुराना सवाल, नई राजनीति
सिरिसेना और विक्रमसिंघे के बीच विवाद एक मुद्दे पर न होकर कई मुद्दे पर है. इकॉनमिक रिफॉर्म से लेकर नितिगत फैसले और लिट्टे से सिविल वार के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन में मिलिट्री अफसरों के खिलाफ जांच ऐसे मुद्दे हैं जिनपर दोनों नेताओं के मत अलग-अलगे हैं. दरअसल, दोनों के बीच विवाद की असली वजह यही है.दूसरी तरफ देखें तो राजपक्षे और शिरिसेना पूर्व सहयोगी रह चुके हैं. राजपक्षे की सरकार में शिरिसेना स्वास्थ्यमंत्री रह चुके हैं. इसके बाद शिरिसेना ने राजपक्षे की पार्टी को तोड़ दिया था और अपनी पार्टी बना ली थी.

क्या ये भारत के लिए बुरी खबर है?
श्रीलंका में चीन की दखल बढ़ती जा रही है. राजपक्षे के दौर में श्रीलंका वहां कई बिलियन डॉलर खर्च करता था, जिससे उसने एक बड़ा इनफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है. इन दिनों वहां जिस तरह से पॉलिटिकल डेवलपमेंट हुआ और श्रीलंका चीन को छोड़कर धीरे-धीरे भारत के करीब आ गया. राजपक्षे ने भारत के तरफ दोस्तान रुख अपनाया. पिछले छह महीने को गौर करें तो श्रीलंका में बदले राजनैतिक हालात और वहां बन रहे मुद्दे भारत और चीन के बीच दक्षिण ध्रुव में प्रतिद्वंधिता को गहरा करते जा रहे हैं. श्रीलंका में बिजिंग यदि मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब रहता है तो मालदीव में उसका प्रभाव बढ़ जाएगा. मालदीव में भी हाल ही में चुनाव हैं, जहां पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन भारत की कीमत पर चीन के करीब हो सकते हैं.

You Might Also Like