लालू की लाठी रैली से सबक ले रहे तेजस्वी

लालू की लाठी रैली से सबक ले रहे तेजस्वी

राजद की संविधान बचाओ यात्राओं के दौरान जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ को देखकर तेजस्वी यादव जितना गदगद हो रहे होंगे, लगभग उतना ही आशंकित भी हैं। कारण, राबड़ी सरकार के अंतिम समय में लालू प्रसाद की रैलियों एवं जनसभाओं में लगभग ऐसी ही भीड़ उमड़ती थी, जो जरूरत पडऩे पर वोट में तब्दील नहीं हो पाई थी और लालू की लालटेन की लौ धीरे-धीरे मद्धिम पड़ गई थी। 
खासकर, लालू की 2003 की लाठी रैली और उसके नतीजे से सबक लेकर राजद तेजस्वी की जनसभाओं में जुट रहे जनमन को जानने और वोट में बदलने की जुगत में है। 

लालू की सियासी विरासत का तेजस्वी स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं। राजद में सुधार की जिम्मेदारी भी अब सिर्फ उन्हीं पर है। शायद इसीलिए जनसभाओं में तेजस्वी अपने पिता की शैली का अनुकरण तो करते दिखते हैं, किंतु उनकी गलतियों से पीछा छुड़ाने की कोशिश भी करते दिखते हैं। 

फिलहाल उन्हें सबसे बड़ी आशंका अपने कोर वोटरों के अति उत्साह से है, जिसकी दबंगई के कारण लालू की राजसत्ता चली गई थी। तब लालू ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें थोड़ा-थोड़ा अहसास हो चला था। 
अब लालू प्रसाद जेल में हैं और तेजस्वी के ऊपर पार्टी को बचाने-संभालने और आगे बढ़ाने का दायित्व है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी टीम को माइक्रो मैनेजमेंट की जिम्मेदारी देते हुए नसीहत भी दी है कि राजद के कोर समर्थकों को समझाएं कि उनके अति उत्साह से अन्य समुदाय के लोग बिदक सकते हैं।  

तेजस्वी खुद भी पहल कर रहे हैं। सबको लेकर चलने की कोशिश है, क्योंकि अहसास है कि उनके कोर वोटरों का अंदाज जितना आक्रामक होगा, अन्य समुदाय के समर्थक पार्टी से उतनी ही दूर होते जाएंगे। इसलिए रैली के पहले और बाद में समर्थकों को समझाने और अनुशासन में रहने का दौर भी चलता है। 
विवादित चेहरों से परहेज भी करते दिखते हैं। नवादा की जनसभा में विपक्ष ने गंभीर मामले में आरोपी राजद विधायक राजबल्लभ यादव के साथ तेजस्वी की तस्वीर का मामला उठाया तो उन्होंने साफ पल्ला झाड़ लिया।  

लाठी रैली का उलटा हुआ था असर  

राबड़ी सरकार के आखिरी दिनों में सितंबर 2003 में लालू ने बड़ी ठसक से लाठी रैली का आयोजन किया था। तब बिहार के जनमानस में लाठी को लालू के समर्थकों का प्रतीक माना जाता था। पटना के गांधी मैदान में लाठी रैली बुलाकर लालू ने जितनी सुर्खियां बटोरी थी, करीब उतना ही उसका उल्टा असर हुआ था। 
रैली तो सफल हो गई थी, लेकिन लालू का मकसद नहीं। 2005 के जनवरी में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ तो राबड़ी सरकार का पतन हो गया था। रैली की भीड़ वोट में तब्दील नहीं हो पाई थी।

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