दूसरे विश्व युद्ध के बाद ग्लोबल वार्मिंग के बदलाव की दर अधिकतम दर्ज

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ग्लोबल वार्मिंग के बदलाव की दर अधिकतम दर्ज

वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग वैश्विक स्तर की सबसे बढ़ी समस्या बनी हुई है। इस चुनौती से निपटने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक और संस्थाएं प्रयासरत हैं। वहीं, अब इस संबंध में किए गए एक अध्ययन में चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन में बताया गया है कि बीते 100 वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग कभी नहीं रुकी। वहीं, दूसरे विश्व युद्ध के बाद इसके बदलाव की दर अधिकतम दर्ज की गई। यानी इस घटना के बाद से धरती के तापमान का बढ़ना और तेज हो गया।

 

चाइनीज अकेडमी ऑफ साइंसेज के जिंगांग दाई कहते हैं, हमारा अध्ययन इस बात के संकेत देता है कि यदि मल्टीडेकडाल जलवायु चक्र की पुनरावृत्ति होती है तो भविष्य में जलवायु स्थितियों में मल्टीडेकडाल कूलिंग और ग्लोबल वार्मिंग के बीच निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। सरल शब्दों में कहें तो धरती को ठंडा रखने वाले कारक अपने प्रयास जारी रखेंगे, लेकिन तापमान का बढ़ना जारी रहेगा।

केवल यहां देखी गई तापमान वृद्धि में रुकावट

अध्ययन से पता चला है कि वैश्विक औसत सतह तापमान (जीएमएसटी) में ऊपरी बिंदू की प्रवृत्ति 20वीं सदी के पहले दशक के दौरान धीमी पड़ी या कहीं-कहीं रुक भी गई। यद्यपि कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर में वृद्धि इस दौरान भी निरंतर जारी रही और वर्ष 2013 में इसका स्तर 400 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) के करीब पहुंच गया। केवल इस प्रकरण को ही ग्लोबल वार्मिंग अंतराल या मंदी कहा जाता है। इस अंतराल को निकट-शून्य प्रवृत्ति के रूप में चिह्नित किया जाता है।

तीन दशक से निश्चित दर में बढ़ रही गर्मी

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस नवीन अध्ययन से स्पष्ट है कि 100 वर्षों से ग्लोबल वार्मिंग निरंतर जारी है और बीते तीन दशकों में इसमें एक निश्चित दर में वृद्धि हो रही है। शोधकर्ताओं ने कहा कि 2014 अल निनो दक्षिणी ऑसीलेशन (ईएनएसओ) घटना के रूप में समाप्त हुआ था, जो भूमध्य रेखा के मध्य पूर्व प्रशांत क्षेत्र में विकसित हो रहा था। इससे पृथ्वी के तापमान में तेजी से वृद्धि हुई।  

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