विश्व हिन्दू परिषद यहां जहां धर्म संसद करने जा रही है, वहीं शिवसेना भी यहां बड़ा कार्यक्रम कर रहा है

विश्व हिन्दू परिषद यहां जहां धर्म संसद करने जा रही है, वहीं शिवसेना भी यहां बड़ा कार्यक्रम कर रहा है

धार्मिक नगरी अयोध्या एक बार फिर से सुर्खियों में है. विश्व हिन्दू परिषद यहां जहां धर्म संसद करने जा रही है, वहीं शिवसेना भी यहां बड़ा कार्यक्रम कर रहा है. इसे देखते हुए राज्य पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं. अयोध्या के विवादित स्थल का मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में लंबित है. विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना और साधु-संतों का आरोप है कि कोर्ट जानबूझकर इस मामले को लटकाए हुए है. वे चाहते हैं कि सरकार संसद में अध्यादेश लाकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे. कुछ साधु-संत ये भी बयान दे चुके हैं कि वे कोर्ट के फैसले का इंतजार कि बिना आंदोलन करके झटके में यहां राम मंदिर निर्माण कर देंगे. ऐसे बयानों को देखते हुए प्रदेश सरकार ने यहां सुरक्षा पुख्ता कर दी है.

ये तो हम सभी जानते हैं कि अयोध्या में हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी थी. इस घटना के बाद से यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है. बाबरी विध्वंस के बाद से विवादित स्थल की चाक-चौबंदी सुरक्षा कर दी गई है. यह मामला कोर्ट में लंबित है. आज की युवा पीढ़ी यही मानती है कि 1992 की घटना के बाद से ही यह मामला सुर्खियों में है, लेकिन आपको बता दें कि अयोध्या में विवादित स्थल को लेकर करीब 165 साल पहले भी यहां सांप्रदायिक हिंसा हुए थे.

इतिहास के जरिए समझते हैं विवादित स्थल का इतिहास
फरगान का आक्रमणकारी ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर ने 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली सल्तनत के अंतिम वंश (लोदी वंश) के सुल्तान इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में दाखिल हुआ था. बाबर ने इसके साथ ही भारत में मुग़ल वंश की स्थापना की थी. इतिहासकार मानते हैं कि भारत में आते ही बाबर ने यहां बड़े पैमाने पर मस्जिदों का निर्माण कराना शुरू कर दिया था. उसने पानीपत में पहली मस्जिद बनवाई थी. इसके दो साल बाद बाबर ने 1528 में अयोध्या में एक मस्जिद बनवाया. इस मस्जिद को बनवाने के लिए बाबर ने ऐसी जगह चुनी जिसे हिंदू अपने अराध्य भगवान श्रीराम का जन्म स्थान मानते हैं.
अंग्रेजों ने यूं सुलझाया था विवाद
देश में जब तक मुगलों का शासन रहा तब तक अयोध्या में विवादित स्थल को लेकर कभी भी कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ. 1853 में पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक हिंसा हुआ थे. उस वक्त भी हिंदू यहां बने मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनवाना चाहते थे. इस हिंसा के वक्त देश में अंग्रेजों का शासन था. हिंसा को शांत करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने एक फॉर्मूला ढूंढा था, जिसके तहत यहां विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी गई थी. बाबरी मस्जिद परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी. इसके बाद यह प्रक्रिया लगातार चलती रही.

साल 1949 में भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं. कथित रूप से कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाई थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया. सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके यहां ताला लगा दिया. तब से विवादित स्थल पर दावेदारी को लेकर दोनों पक्ष कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं.

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