यदि वह बुद्धिस्ट संत न होते तो शांति के लिए आज भी किसी चीनी राजकुमारी से शादी करने को राजी हो जाते…

यदि वह बुद्धिस्ट संत न होते तो शांति के लिए आज भी किसी चीनी राजकुमारी से शादी करने को राजी हो जाते…

यदि वह बुद्धिस्ट संत न होते तो शांति के लिए आज भी किसी चीनी राजकुमारी से शादी करने को राजी हो जाते…। तिब्बत में शांति को लेकर यह कहने के बाद बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा खिला-खिलाकर हंस पड़े। कहा,चीनी इतिहास और साहित्य इस बात का गवाह है कि तिब्बत हमेशा से एक स्वतंत्र देश था। इतिहास में सातवीं शताब्दी में एक तिब्बती राजा के चीनी राजकुमारी से विवाह का भी उल्लेख मिलता है। संयुक्त राष्ट्र में वर्ष 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तिब्बत का मुद्दा जरूर रखा था, उसके बाद से कोई बड़ी पहल नहीं हुई। उनका मानना है कि यूएन में तिब्बत मसले पर बातचीत की पहल होनी चाहिए, वह तिब्बत मामले का हल युद्ध में नहीं देखते हैं।

भारत-चीन साथ आ जाए तो हल हो जाएगी पाकिस्तान की समस्या

संकिसा में आयोजित भव्य कार्यक्रम में आए बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा फर्रुखाबाद के एक होटल में ठहरे हैं, मंगलवार को यहां पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि आज भी हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा सार्थक है। यदि ऐसा हो सके तो पाकिस्तान की समस्या अपने आप हल हो जाएगी। कहा, भारत और चीन एक दूसरे को नष्ट करने की स्थिति में नहीं है, इस लिए दोनों को सामांजस्य के साथ एक परिवार की तरह रहना चाहिए। जिस तरह पति-पत्नी एक दूसरे से झगड़ते भी हैं लेकिन रहते साथ में हैं। चीन और भारत एक दूसरे के लिए आर्थिक आवश्यकता भी हैं।

खुद को भारत का बेटा मानते हैं

बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा ने बताया कि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा भारत में गुजरा है, वह आज भी भारत के हवा और पानी पर जीवित हैं। इसलिए वह स्वयं को भारत का बेटा मानते हैं। कहा, चीन वह मुल्क है जिसमें एक भारतीय धर्म के सर्वाधिक मतावलंबी रहते हैं। तिब्बत के बारे में भारत के रवैये को रखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि एक बार पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने उनके सामने चीन का भाग होने और चीन के भीतर एक सवायत्त देश होने के बीच का अंतर बताया था। हम आज भी वहीं खड़े हैं।

विनोबा भावे की अवधारणा आज भी प्रासंगिक

दलाई लामा ने अपनी एक मुलाकात का जिक्र करते हुए बताया कि विनोबा भावे ने अफगानिस्तान, बर्मा, श्रीलंका को समाहित करते हुए भारत की अवधारणा रखी थी, जो आज भी प्रासंगिक है। यदि ऐसा होता तो पाकिस्तान की समस्या न होती। पाकिस्तान के मुद्दे पर कहा कि धर्म के आधार पर इसका फैसला नहीं होना चाहिए। आज भी सीरिया, अफगानिस्तान और खुद पाकिस्तान में ही शिया और सुन्नी आपस में एक दूसरे की हत्याएं कर रहे हैं। विश्व शांति पर उन्होंने कहा कि दो विश्व युद्धों के बाद शायद दुनिया को समझ आ गई है और योरोपीय यूनियन जैसे मंच इसकी मिसाल हैं। फिर भी हमें शांति की दिशा में अभी दूर तक जाना है। वर्ष 2001 से वह राजनीति से रिटायर हो चके हैं और अब अपना पूरा जीवन उन्होंने शांति को समर्पित कर दिया है।

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