16वीं शताब्दी में ही बिहार में रखी गई थी मॉल संस्कृति की नींव, जानिए

आधुनिकता की इस जिंदगी में मॉल संस्कृति की परंपरा हाल में तेजी से बढ़ी है। लेकिन, बेतिया महाराज ने तकरीबन 325 वर्ष पहले ही लोगों की जरूरत को महसूस करते हुए मॉल कल्चर को बढ़ावा दिया था। इसके लिए शहर में मीना बाजार की स्थापना की थी।

कहा जाता है कि यहां एक ही छत के नीचे सुई से लेकर जहाज तक की बिक्री होती थी। आज भी जिले के किसी भी घर में शादी-ब्याह या महत्वपूर्ण उत्सव होता है तो खरीदारी के लिए जेहन में सबसे पहले मीना बाजार की याद आती है। अभी इस बाजार में एक ही छत के नीचे लगभग तीन हजार दुकानें हैं।

बेतिया महाराज दिलीप सिंह ने (वर्ष 1694-1715) शहर के दक्षिणी हिस्से में ऐसे बाजार की शुरुआत कराई थी। महाराज के जो भी अतिथि आते थे, बाजार में भ्रमण और खरीदारी करने जरूर जाते थे। बेतिया राज का अस्तित्व समाप्त होने के बाद ब्रिटिश काल में भी बाजार की रौनक बरकरार रही। 

नेपाल तक थी बाजार की ख्याति

इतिहासकार रेवतीकांत दुबे कहते हैं कि इस बाजार की ख्याति नेपाल के अलावा कई राज्यों में थी। वहां के व्यापारी भी आते थे। कई सामान दूसरे राज्य से लाकर यहां बेचा जाता था। बाहरी व्यापारी यहां से अनाज सहित अन्य उपयोगी सामग्री खरीदकर ले जाते थे। बाजार में प्रवेश के लिए चारों दिशाओं में द्वार बनाए गए थे। महाराज ने मोतिहारी में भी इसी तर्ज पर मीना बाजार बनवाया था, जो आज भी है। 

बेतिया राज के प्रबंधक विनोद सिंह का कहना है मीना बाजार निश्चित रूप से किसी मॉल से बहुत बड़ा बाजार है। इसे हर हाल में और अधिक सजाया व संवारा जाएगा। इसके लिए शीघ्र ही कार्ययोजना बनाकर सरकार को भेजा जाएगा।   

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