महासंग्राम 2019: लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को लेकर भाजपा सतर्क

महासंग्राम 2019: लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को लेकर भाजपा सतर्क

अगले लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections 2019) में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अहम हो सकती है। इसलिए भाजपा अपने सहयोगियों को किसी भी रूप में नाराज नहीं होने देना चाहती है। लोकजनशक्ति पार्टी को मनाने के बाद पार्टी शिवसेना, अपना दल और सोहेलदेव पार्टी को भी मनाने में जुटी है। शिवसेना के साथ अगले कुछ दिनों में चुनावी गठबंधन होने के आसार हैं।

भाजपा के चिंतित होने की कई वजहें हैं। पिछले पौने पांच सालों के दौरान 27 लोकसभा सीटों के उप चुनाव हुए हैं। इन चुनावों के नतीजे दर्शाते हैं कि भाजपा ने अपनी आठ सीटें खोई जबकि पांच सीटों को ही वह वापस जीत पाई। तृणमूल ने अपनी चार सीटें, टीआरएस ने दो, आरजेडी, बीजेडी, एनपीपी, एनपीएफ ने अपनी एक-एक सीटें फिर से हासिल की। सपा ने एक सीट दोबारा जीती और दो सीटें भाजपा से छीनी। रालोद और एनसीपी ने भाजपा से एक-एक सीटें छीनी। जबकि कांग्रेस ने एक सीट दोबारा जीती और चार सीटें भाजपा से छीनी। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस ने जहां अपना वर्चस्व कायम रखा या उसका विस्तार किया। लेकिन भाजपा केंद्र एवं संबंधित राज्यों में सत्ता में रहते हुए भी कमजोर पड़ी।

शिवसेना इसलिए महत्वपूर्ण है
पिछला लोकसभा चुनाव भाजपा और शिवसेना ने मिलकर लड़ा था जिसमें शिवसेना को 18 और भाजपा को 23 सीटें मिली। यह महाराष्ट्र में शानदार जीत थी। लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा अकेले मैदान में उतरी। दरअसल, भाजपा को लगा कि उसकी स्थिति बेहतर है। शिवसेना तभी से नाराज है। वह सबसे पुराना घटक है। केंद्र एवं राज्य में शिवसेना सरकार में है। इसलिए आज भी वह मिलकर चुनाव लड़ने के पक्ष में है। लेकिन चाहती है कि लोकसभा के साथ विधानसभा चुनावों में भी सीटों का फार्मूला तय है।

बिहार फार्मूला
इन दिनों यह चर्चा है कि बिहार की तरह बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने का फार्मूला वहां भी तय हो सकता है। लेकिन शिवसेना का रुख थोड़ा अलग है। लोकसभा में उसे कम सीटें भी मान्य हैं। विधानसभा चुनाव के लिए उसे ज्यादा सीटें चाहिए। शिवसेना के नेता संजय राउत कहते हैं कि केंद्र में भाजपा बड़ा भाई है तो राज्य में शिवसेना। वह इस बात को समझे। इसलिए माना जा रहा है कि बात तभी बनेगी जब विधानसभा चुनाव भी साथ लड़ने की बात पक्की होगी और सीटों का भी बंटवारा हो जाएगा। लेकिन भाजपा को डर यह है कि शिवसेना अपने मुख्यमंत्री की मांग रख सकती है।

पुराना सहयोगी
शिवसेना को तरजीह देने की मुख्य वजह एक पुराना सहयोगी होना है। दूसरे, महाराष्ट्र में अच्छा प्रभाव होना है। जहां वह खुद 15 से ज्यादा सीटें जीत सकती है, वहीं कई सीटों पर उसका वोट भाजपा को भी जिता सकता है। दूसरे, भाजपा की सीटें पहले से कम होने की आशंका है। ऐसे में पहले से ज्यादा सहयोगी दलों का होना उसके लिए चुनाव बाद फायदेमंद हो सकता है।

यूपी के दो दल
भाजपा से जुड़े सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश के दो छोटे दलों अपना दल और सोहलदेव को भी मनाया जाएगा। सोहलदेव हालांकि अभी राज्य सरकार में हिस्सेदार है। लेकिन इन्हें साथ रखने से फायदे की उम्मीद है।

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