उत्तराखंड में बसपा के समक्ष सपा ने किया सियासी समर्पण

उत्तराखंड में बसपा के समक्ष सपा ने किया सियासी समर्पण

उत्तर प्रदेश में हुए चुनावी गठबंधन को सपा और बसपा ने उत्तराखंड में भी आगे बढ़ाने का फैसला किया है। फर्क है तो महज इतना कि उत्तराखंड में बसपा स्वयं चार सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि केवल एक सीट सपा को दी गई है।

महत्वपूर्ण बात यह कि जिन दो मैदानी भूगोल वाली सीटों हरिद्वार और नैनीताल पर सपा-बसपा का ठीकठाक जनाधार कहा जा सकता है, वहां से बसपा ही मैदान में उतरेगी। इसके अलावा टिहरी व अल्मोड़ा सीटें भी बसपा के हिस्से आई हैं, जबकि एकमात्र पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट पर अखिलेश यादव सपा की साईकिल दौड़ाएंगे।

आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए अब सपा-बसपा ने उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड की पांच लोकसभा सीटों पर भी गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। हालांकि यह पहले से ही तय माना जा रहा था, मगर जिस तरह बसपा ने सपा को राज्य की पांच में से केवल एक सीट तक समेट दिया, वह जरूर हैरतभरा रहा। दिलचस्प बात यह कि सपा को जो पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट दी गई, वहां पार्टी का कोई खास जनाधार ही नहीं रहा है।

दौ मैदानी जिलों में सपा-बसपा का जनाधार केवल राज्य के दो जिले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर ही ऐसे है, जहा का राजनैतिक परिवेश और जातीय गणित काफी कुछ उत्तर प्रदेश की राजनीति से मेल खाता है।

सपा और बसपा का पारंपरिक माना जाने वाला वोट बैंक इन दो जिलों में महत्वपूर्ण स्थिति में है। इन दो जिलों में विधानसभा की कुल 20 सीटें आती हैं। ऊधमसिंह नगर नैनीताल सीट के अंतर्गत है जबकि हरिद्वार अलग लोकसभा सीट है। इसके बावजूद बसपा ने इन दोनों में से एक भी सीट सपा को नहीं दी। उस पर अचरज यह कि सपा ने केवल पौड़ी सीट मिलने पर भी गठबंधन को हामी भर दी। इसे सपा का बसपा के सामने सियासी समर्पण ही माना जा रहा है।

राज्य गठन से पूर्व सपा की रही मौजूदगी 

यहां यह जिक्र करना अहम है कि सपा और बसपा की उत्तराखंड में लोकसभा व विधानसभा चुनावों में जीत केवल दो मैदानी जिलों हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर तक ही सीमित रही, पर्वतीय जिलों में ये दोनों पार्टिया शायद ही किसी सीट पर मुख्य मुकाबले का हिस्सा बन पाई।

अलबत्ता अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय सपा का सियासी प्रदर्शन इस क्षेत्र में ठीकठाक रहा। वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में सपा ने वर्तमान उत्तराखंड के भौगोलिक क्षेत्र में आने वाली 22 सीटों पर चुनाव लड़ा और तीन पर जीत हासिल की। महत्वपूर्ण यह कि सपा को यह सफलता तब मिली, जब वर्ष 1994 के राज्य आदोलन के चरम के दौरान सपा की छवि उत्तराखंड में खलनायक सरीखी बन गई थी।

उत्तराखंड में सपा का चुनावी प्रदर्शन 

वर्ष 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में सपा ने राज्य विधानसभा की 70 में से 63 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, मगर जीत एक भी सीट पर नहीं मिली। सपा के हिस्से कुल 6.27 प्रतिशत मत आए। हालाकि इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए राज्य की पाच में से एक, हरिद्वार लोकसभा सीट पर जीत दर्ज करने में कामयाबी हासिल की।

यह उत्तराखंड में सपा की अब तक की एकमात्र चुनावी जीत रही है। वर्ष 2007 के दूसरे विधानसभा चुनाव में सपा ने 55 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए, लेकिन नतीजा इस बार भी शून्य रहा।

मत प्रतिशत भी गिरकर 4.96 तक पहुंच गया। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 45 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 1.45 प्रतिशत मत हासिल किए। वर्ष 2017 में संपन्न राज्य विधानसभा के चौथे चुनाव में पार्टी ने केवल 25 सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन इनमें से एक सीट पर भी वह जीत दर्ज नहीं कर पाई। इस बार उसका मत प्रतिशत महज 0.4 तक सिमट गया।

बसपा रही तीसरी बड़ी सियासी ताकत 

बसपा उत्तराखंड बनने के बाद तीसरी सबसे बड़ी सियासी ताकत के रूप में उभरी। भाजपा और काग्रेस के बाद बसपा के ही सर्वाधिक विधायक चुने गए। वर्ष 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में बसपा के सात विधायक चुने गए और तब उसे मिले 10.93 प्रतिशत मत। वर्ष 2007 के चुनाव में बसपा के आठ विधायक बने और मत मिले 11.76 प्रतिशत।

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल तीन सीटों पर जीत मिली, जबकि उसका मत प्रतिशत रहा 12.19। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा 6.98 प्रतिशत मत ही हासिल पाई, जबकि उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली।

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