Kargil Vijay Diwas: जब पाकिस्‍तान की नापाक सोच पर भारी पड़ा था भारत का ‘ऑपरेशन विजय’

नई दिल्ली – कारगिल की जंंग ने उस सोच को गलत साबित कर दिखाया जिसमें दुश्‍मन की रणनीतिक मजबूती के आगे घुटने टेक देने बात कही जाती थी। इस जंंग में दुश्मन चोटी पर था, सीना ताने भारतीय जवान पहाड़ी के नीचे उसे ललकार रहे थे। भारतीय जवानों ने अपनी जान की परवाह नहीं की दुर्गम पहाडि़यों पर चढ़कर देश में घुसपैठ करने के पाकिस्तान के नापाक मंसूबे को चूर-चूर कर दिया। यह जंग लगभग 60 दिनों तक चली। 20 साल पहले आज (26 जुलाई) ही के दिन 1999 में कारगिल जंग में विजय की घोषणा हुई थी। इस जंग के बाद देश में एक पूरी पीढ़ी तैयार हो चुकी है, जो इस जंग के अमर शहीदों की वीरता और शौर्य से प्रेरित और गर्वित होगी। हर भारतीय के लिए यह दिन राष्ट्रभक्ति के भाव से भर देने वाला है।
ऑपरेशन बद्र की नापाक साजिश

1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद भी कई सैन्य संघर्ष होते रहे। दोनों देशों द्वारा परमाणु परीक्षण के कारण तनाव और बढ़ गया था। स्थिति को शांत करने के लिए दोनों देशों ने फरवरी 1999 में लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसमें कश्मीर मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का वादा किया गया था। लेकिन पाकिस्तान अपने सैनिकों और अर्धसैनिक बलों को छिपाकर नियंत्रण रेखा के पार भेजने लगा और इस घुसपैठ का नाम ‘ऑपरेशन बद्र’ रखा। इसका मुख्य उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना और भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाना था। वह भारत का संपर्क एनएच-1 से पूरी तरह काट देना चाहता था

।बड़े हमले का मुंहतोड़ जवाब

शुरुआत में इसे घुसपैठ माना गया और दावा किया गया कि इन्हें कुछ ही दिनों में बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन नियंत्रण रेखा पर खोजबीन और इन घुसपैठियों की रणनीति का पता चलने के बाद भारतीय सेना को अहसास हो गया कि हमले की योजना बड़े पैमाने पर की गई है। इसके बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय के तहत दो लाख सैनिकों को मोर्चे पर भेजा। मई से शुरू हुआ यह युद्ध आधिकारिक रूप से 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुआ।

अपनों ने ही खोली साजिशकर्ता मुशर्रफ की पोल
पाकिस्तान ने दावा किया कि इस युद्ध को लड़ने वाले सभी कश्मीरी आतंकी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेजों और

पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल थी। माना जाता है कि सेनाध्यक्ष बनने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने ही इसे अंजाम दिया था। पाक के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी अपनी भूमिका से इंकार किया था और मुशर्रफ को ही जिम्मेदार ठहराया था।
इतना ही नहीं मुशर्रफ के रिश्तेदार ले. जनरल (रि.) शाहिद अजीज ने अपनी पुस्तक ‘ये खामोशी कहां तक’ और पाक सेना में कर्नल रहे अशफाक हुसैन ने ‘विटनेस टू ब्लंडर-कारगिल स्टोरी अनफोल्ड्स’ नाम की अपनी किताब में मुशर्रफ की भूमिका को स्पष्ट किया है और दोषी ठहराया है

।पाकिस्तान में तख्तापलट

पाकिस्तान में इस युद्ध के कारण राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ गई और नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति बने। दूसरी ओर भारत में इस युद्ध के दौरान देशप्रेम का उबाल देखने को मिला। देश एकसूत्र में और मजबूती से एकजुट हुआ। भारत सरकार ने रक्षा बजट और बढ़ाया।

हर मिनट एक राउंड फायर

इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान करीब दो लाख पचास हजार गोले दागे गए। वहीं, 5,000 बम फायर करने के लिए 300 से ज्यादा मोर्टार, तोपों और रॉकेटों का इस्तेमाल किया गया। लड़ाई के 17 दिनों में हर रोज प्रति मिनट एक राउंड फायर किया गया। बताया जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यही एक ऐसा युद्ध था जिसमें दुश्मन देश की सेना पर इतनी बड़ी संख्या में बमबारी की गई थी।

18 हजार फीट पर लड़ी लड़ाई
भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का भी इस्तेमाल किया। इसके बाद जहां भी पाकिस्तान ने कब्जा किया था वहां बम गिराए गए। मिग-29 से पाकिस्तान के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलों से हमला किया गया। यह युद्ध करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर हुआ। दोनों देशों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

चरवाहों से मिली घुसपैठ की सूचना

विटनेस टू ब्लंडर- कारगिल स्टोरी अनफोल्ड्स’ में दावा किया गया है कि पाकिस्तान की 6 नार्दर्न लाइट इंफैंट्री के कैप्टन इफ्तेखार और लांसनायक हवलदार अब्दुल हकीम 12 सैनिकों के साथ कारगिल की आजम चौकी पर बैठे हुए थे तभी उन्होंने देखा कि कुछ भारतीय चरवाहे कुछ दूरी पर अपने मवेशियों को चरा रहे थे। पहले तो उन्होंने बंदी बनाना चाहा लेकिन बाद में जाने दिया। करीब डेढ़ घंटे बाद यही चरवाहे भारतीय सेना के 6-7 जवानों के साथ वहां वापस लौटे। दूरबीनों से इलाके का मुआयना किया और वापस चले गए। कुछ घंटे बाद वहां एक लामा हेलिकॉप्टर उड़ता हुआ आया। वह काफी नीचे था। यही पहला मौका था जब भारतीय सैनिकों को भनक पड़ी कि बहुत सारे पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की पहाडिय़ों पर कब्जा जमा लिया है।

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