RTI बिल पर समर्थन के लिए सोनिया गांधी से संपर्क कर सकती है सरकार

RTI संशोधन बिल लोकसभा में पास हो चुका है. अब सरकार इसे राज्यसभा में पास करवाना चाहती है. इसके उलट इसे रोकने के लिए विपक्ष ने भी खास रणनीति बनाई है. राज्यसभा में रोकने के लिए 14 दलों के राज्यसभा सदस्य एकजुट हो गए हैं. विपक्ष का कहना है कि इस बिल को पास करने से पहले सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए.

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, सरकार RTI बिल को पास करवाने के लिए सोनिया गांधी से मदद मांग सकती है. इसके अलावा कल दोनों सदनों के सत्र के विस्तार की भी घोषणा हो सकती है. RTI बिल को रोकने के लिए एकत्रित हुए इन 14 दलों के पास राज्यसभा में कुल 111 सदस्य हैं. जबकि 245 सदस्यीय राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा 123 सदस्यों का है.

अभी राज्यसभा में एनडीए के पास बहुमत के आंकड़े से आधे दर्जन सदस्य कम हैं. ऐसे में अगर विपक्ष ने कुछ और सांसदों को अपने पाले में किया तो फिर आरटीआई बिल पास कराने के दौरान पक्ष-विपक्ष में कांटे की लड़ाई हो सकती है. इससे पहले लोकसभा में वोटिंग के बाद सूचना का अधिकार संशोधन बिल पास हो चुका है. इसके पक्ष में 218 सांसदों ने वोट किया जबकि विपक्ष में 79 वोट पड़े थे. अब सरकार राज्यसभा में इस बिल को पास कराकर कानून की शक्ल देना चाहती है.

क्या होने हैं बदलाव

सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 में मोदी सरकार दो खास बदलाव करना चाहती है. 2018 में भी मोदी सरकार ने आरटीआई (संशोधन) बिल पास कराने की तैयारी की थी, मगर भारी विरोध के कारण सरकार को कदम खींचने पड़े थे. अब लोकसभा में सरकार संशोधन बिल पास कराने में सफल रही है.

राज्यसभा से भी बिल पास होने पर पुराने एक्ट में दो मुख्य बदलाव होंगे

.1- अब तक सूचना आयुक्त का पांच साल का तय कार्यकाल होता है. अधिकतम उम्र सीमा 65 साल तक है. इसमें जो भी पहले पूरा होगा, उसे माना जाएगा. सरकार अब इस व्यवस्था को बदलना चाहती है. संशोधन बिल में कहा गया है कि सूचना आयुक्तों का कार्यकाल सरकार निर्धारित करेगी. विपक्ष का कहना है कि जब कार्यकाल सरकार तय करेगी तो आयुक्तों की स्वतंत्रता प्रभावित होगी.
2- आरटीआई संशोधन बिल पास होने पर वेतन और भत्ते तय करने का अधिकार भी केंद्र सरकार को मिल जाएगा. जबकि 2005 में बने मूल कानून में यह व्यवस्था है कि केंद्रीय स्तर पर मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों में चुनाव आयोग का नियम लागू होगा. यानी उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की तरह वेतन भत्ते प्राप्त होंगे.

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