सत्त्ता संग्राम: सासाराम के बूते इंदिरा गांधी पर भारी पड़े थे जगजीवन राम

सत्त्ता संग्राम: सासाराम के बूते इंदिरा गांधी पर भारी पड़े थे जगजीवन राम

जगजीवन राम को सासाराम ने बड़ा संबल दिया था। 1977 में आपातकाल के बाद जब उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था, तब भी सासाराम ने उनका साथ नहीं छोड़ा था। उस चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी अपने-अपने क्षेत्र से हार गए थे, किंतु जगजीवन जीत गए थे। वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, किंतु मोरारजी देसाई उनपर भारी पड़ गए थे।

आजादी के पहले से ही विभिन्न राजनीतिक पदों पर रहते आ रहे जगजीवन ने आजादी के बाद लगातार आठ बार जीत दर्ज की। विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेवारी संभाली। अब जगजीवन की विरासत उनकी पुत्री मीरा कुमार के हाथ में है।

अभी भाजपा का सीट पर कब्‍जा

अभी सासाराम का भाजपा के छेदी पासवान प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सासाराम में एक किवंदती प्रचलित है कि मीरा को हराने का दम सिर्फ छेदी पासवान में है। जगजीवन के निधन के बाद जब 1989 में कांग्रेस ने मीरा को टिकट थमाया था तो दिल्ली में बैठे लोगों ने मान लिया था कि सासाराम में जगजीवन युग की वापसी हो जाएगी, लेकिन इस मान्यता को छेदी पासवान ने ध्वस्त कर दिया। जनता दल के प्रत्याशी के रूप में उन्होंने एक लाख से ज्यादा वोटों से मीरा को हराया।

दो लड़ाइयों के बाद मीरा मुख्य मुकाबले से भी बाहर हो गई। 1996 से यहां भाजपा के मुनीलाल ने लगातार तीन जीत दर्ज की। 2004 में मीरा ने पहली इंट्री मारी। उसके बाद सासाराम मीरा और मुनी का बैटल फील्ड बन गया। लगातार दो बार मुनी के हारने के बाद भाजपा ने 2014 में छेदी पर दांव लगाया। तबसे मीरा बनाम छेदी का संघर्ष शुरू हो गया।

इनमें है टिकट की दावेदारी

भाजपा से अबकी फिर छेदी की ही तैयारी है, किंतु राह में रोड़े अटकाने के लिए सेवानिवृत्त जज ओमप्रकाश ने भाजपा ज्वाइन कर लिया है। एससी-एसटी आयोग के सदस्य योगेंद्र पासवान भी अपने लिए मैदान तैयार कर रहे हैं। अटल बिहारी सरकार में मंत्री एवं तीन बार सांसद रह चुके मुनीलाल के पुत्र शिवेश कुमार की भी नजर है।

हालांकि, कई दलों से कई बार मंत्री, विधायक एवं सांसद रह चुके छेदी की संभावनाओं में छेद करना आसान नहीं है, क्योंकि माहौल भांपकर उन्होंने भी पार्टी के प्रति समर्पण बढ़ा दिया है। उनके पुत्र रवि पासवान भी भाजपा में दोबारा वापसी के बाद सक्रिय हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर चेनारी में सपा प्रत्याशी बनकर हार चुके हैं। रालोसपा अरुण गुट के विधायक ललन पासवान भी मौके की तलाश में हैं।

महागठबंधन में मीरा नाम केवलम है। कद-पद के हिसाब से टिकट मिलने में अगर-मगर नहीं है। हालांकि, उनके भाई सुरेश राम की बेटी ही उन्हें दलित नेता होने पर सवाल खड़े करती रही हैं। पिछली बार जदयू के टिकट पर तीसरे स्थान पर आने वाले केपी रमैया का चुनाव के बाद अता-पता नहीं है। किसी से गठबंधन नहीं हुआ तो बसपा दम दिखा सकती है।

अतीत की राजनीति

सासाराम को पहले शाहाबाद नाम से जाना जाता था। एक चुनाव रामसुभग सिंह जीते थे। उसके बाद जगजीवन राम लगातार आठ बार जीते। कांग्रेस से ऊब गए तो 1977 में अपनी पार्टी बनाकर जीत लिए। आजीवन कोई मुकाबले में नहीं आया। भाजपा से तीन बार मुनिलाल भी सांसद बने। छेदी पासवान ने विभिन्न दलों की सीमा से ऊपर उठकर तीन बार प्रतिनिधित्व किया। शेरशाह सूरी ने सासाराम को प्रसिद्धि दिलाई। आजादी की जंग में भी सासाराम की बड़ी भूमिका रही।

2014 के महारथी और वोट

छेदी पासवान : भाजपा : 366087

मीरा कुमार : कांग्रेस : 302760

केपी रमैया : जदयू : 93310

बालेश्वर भारती : बसपा : 31528

विधानसभा क्षेत्र

मोहनिया (भाजपा), भभुआ (भाजपा), चैनपुर (भाजपा), चेनारी (रालोसपा), सासाराम (राजद), करगहर (जदयू)

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