साहित्य

बुद्धा-ए जर्नी टू द ईस्ट: संस्कृति की अद्भुत जानकारियां, बुलेट ट्रेन में संस्कृति की है यात्रा

जाने-माने लेखक एवं अनुभवी फोटोग्राफर दीपांकर एरोन ने छायाचित्रों एवं लेखन कला को जिस खूबसूरती से इस किताब में उतारा है, वह काबिले तारीफ है. असीम शांति की तलाश में एक छोर से दूसरे

इतिहास के पन्नों को देखें तो अध्यात्म, संस्कृति और दर्शन की खोज सदा से ही मानव का एक प्रिय विषय रहा है. इसी तथ्य को सार्थक करती नियोगी बुक्स द्वारा प्रकाशित एक किताब इन दिनों खूब चर्चा में है. ऑन द ट्रेल ऑफ बुद्धा-ए जर्नी टू द ईस्ट (बुद्ध की राह पर- पूर्व की ओर यात्रा) में अद्भुत कर देने वाली कई जानकारियां शामिल हैं.

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जाने-माने लेखक एवं अनुभवी फोटोग्राफर दीपांकर एरोन ने छायाचित्रों एवं लेखन कला को जिस खूबसूरती से इस किताब में उतारा है, वह काबिले तारीफ है. असीम शांति की तलाश में एक छोर से दूसरे छोर तक भिक्षुओं का विचरण, मंदिरों और मठों की संस्कृति, संग्रहालयों में मूर्तियों का दर्शन, भित्तिचित्रों की कलात्मकता, लोक-जीवन के आचार-विचार, रंग-रूप एवं जात-पात से लेकर उनके सामान्य देवी-देवताओं तक के संस्कार यानी प्राचीन भारत की खोज का एक प्रयास किया गया है, जो चीन, मंगोलिया, कोरिया और जापान की परंपराओं, कला और वास्तुकला में खूबसूरती से संरक्षित है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मिली-जुली संस्कृतियों की विविधता में एकता की खोज का एक प्रयास है.

पुस्तक की प्रस्तावना पद्मभूषण, लोकेश चंद्र द्वारा लिखी गई है. उन्होंने कहा कि, हजारों मन के फूलों से रचित यह किताब सदियों के सोने में लिपटी हुई है. यह बुलेट ट्रेन में संस्कृति की यात्रा है.

गौरतलब है कि लेखक दीपांकर एरोन को भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी के रूप में उनके योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. उनके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं. उत्तराखंड के विश्व धरोहर स्थल, उनकी पहली सचित्रपुस्तक, वर्ष 2010 में प्रकाशित हुई थी

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