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बसपा सुप्रीमो मायावती ने अार्थिक अाधार पर उठाई आरक्षण देने की मांग

लोकसभा में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक पारित होने का स्वागत करते हुए बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि गत दो अप्रैल के सफल भारत बंद के दबाव में ही बिल को पारित कराया गया। उन्होंने राज्यसभा में भी पारित होने की उम्मीद जताते हुए गरीब मुस्लिमों को आरक्षण देने की मांग भी की।

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मंगलवार को जारी बयान में मायावती ने बिल पारित होने पर सभी लोकसभा सदस्यों को धन्यवाद देते हुए कहा कि उम्मीद है, यह बिल राज्यसभा द्वारा भी पारित करा दिया जाएगा। इससे दलित वर्ग के लोगों को मदद मिल सकेगी। मायावती ने कहा है कि अब जरूरत है सभी वर्गो के गरीबों को अारक्षण देने की जिससे हर तबके का गरीब अागे बढ़ सके। 

लोकसभा सदस्यों का आभार जताने के बाद मायावती गत 2 अप्रैल को हुए भारत बंद को विधेयक पारित होने का श्रेय देना नहीं भूली। उन्होंने कहा कि उन लोगों को धन्यवाद, जिन्होंने गत  दो अप्रैल को सफलतापूर्वक भारत बंद का आयोजन किया था। इससे ही केंद्र सरकार पर बिल पास कराने का दबाव बढ़ा। मायावती ने कहा कि सफलता का श्रेय देशवासियों के साथ बड़ी संख्या में बसपा कार्यकर्ताओं को भी दिया जाएगा तो भारत बंद में शामिल रहें। बसपा प्रमुख ने नौकरियों में प्रमोशन में आ रही बाधाओं को दूर करने की मांग को भी दोहराया। उनका कहना था कि भाजपा ऐसा नहीं करती है तो उसकी नीयत और नीति पर संदेह बना रहेगा।

आर्थिक आरक्षण का लाभ सबको मिले

मायावती ने आरक्षण के मुद्दे को हवा देते हुए आर्थिक आधार पर आरक्षण को मजबूती से उठाया। अपरकास्ट  के गरीबों को अलग आरक्षण सुविधा देने में अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को शामिल करने की मांग की। उनका कहना था कि गरीब मुस्लिमों को आर्थिक आरक्षण लाभ दिलाने को संविधान संशोधन किया जाता है तो बसपा हर स्तर पर समर्थन करेगी।

गरीब मुस्लिमों को आरक्षण की सुविधा देने का मुद्दा बसपा ने यूं ही नहीं उठाया है। दरअसल बसपा अध्यक्ष मायावती एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश में है। दलित-मुस्लिम समीकरण को मजबूती देने के साथ गठबंधन में सीटों के बंटवारे में बसपा अपने सहयोगी दलों पर दबाव बनाना चाहती है।

बसपा की निगाह प्रदेश के मुस्लिम वोट बैंक पर लगी है। मायावती को भरोसा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम भाजपा को हराने के लिए बसपा का साथ देने का मन बना सकता है। इसलिए बसपा मुस्लिमों को लुभाने के लिए हर जतन कर रही है। इसी कड़ी में असम में 40 लाख घुसपैठियों के मसले पर बसपा प्रमुख ने मुस्लिमों की सहानुभूति बटोरने की कोशिश की थी।

बसपा का मुस्लिम प्रेम कोई नई बात नहीं है। दलित-मुस्लिम समीकरण के आधार पर गत विधानसभा चुनाव में बसपा उतरी परंतु अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। एक पूर्व मुस्लिम विधायक का कहना है कि दलित मुस्लिम गठबंधन ही सबसे अधिक प्रभावशाली है। गत विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों का सपा बसपा के बीच में बिखराव नहीं होता तो नतीजे कुछ अलग होते। प्रदेश में 18 फीसद दलित और 18 प्रतिशत मुस्लिम मिले तो राजनीति की दिशा बदल सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व गैर भाजपाई दलों के बीच गठबंधन की सुगबुगाहट के बीच बसपा का मुस्लिम कार्ड सीटों के बंटवारे में सहयोगी दलों पर दबाव बनाने का हथियार है। बसपा नेतृत्व सीटों के बंटवारे में सपा से अधिक हिस्सा चाहता है ताकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उसका पलड़ा भारी रहे। मुस्लिमों का रुझान बसपा की ओर बढ़ता है तो उसे लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा की जंग में भी लाभ मिलेगा। गठबंधन की बात बिगडऩे की स्थिति आती है तो भी बसपा दलित मुस्लिम समीकरण के सहारे चुनाव में बेहतर स्थिति में रहेगी।

पीस पार्टी ने दलित मुसलमानों को आरक्षण की मांग उठाई
पीस पार्टी ने दलित मुसलमानों के आरक्षण का मुद्दा गर्मा दिया है। पार्टी अध्यक्ष डॉ. अय्यूब की अगुवाई में एक प्रतिनिधि मंडल ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा। डॉ. अय्यूब ने राज्यपाल से कहा कि 10 अगस्त 1950 को राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा आरक्षण का अधिकार सिर्फ दलित हिंदुओं को दिया गया और बाद में सिख दलितों को भी यह अधिकार मिला। 1990 में बौद्ध दलितों को भी आरक्षण मिला लेकिन अभी तक दलित मुसलमान और दलित ईसाई को इससे वंचित रखा गया। उन्होंने दलित मुसलमानों को भी आरक्षण देने की मांग की है। इस प्रतिनिधि मंडल में पार्टी उपाध्यक्ष असलम जैदी, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अब्दुल मन्नान तथा मोहम्मद इरफान और अफरोज बादल समेत कई प्रमुख लोग मौजूद रहे। 

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