नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर असम की राजनीति में आया भूचाल, बीजेपी ने जताई नाराजगी

नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर असम की राजनीति में आया भूचाल, बीजेपी ने जताई नाराजगी

गुवाहाटी: असम विधासभा अध्यक्ष एवं जोरहाट शहर से निर्वाचित भाजपा विधायक – हितेंद्रनाथ गोस्वामी ने असम की सोनोवाल सरकार और केंद्रीय सरकार के नागरिकता संशोधन विधेयक को सदन से पारित करने की निर्णय को जल्दबाज़ी में लिया फैसला करार देते हुए इस बिल के विरोध में असम में हो रहे प्रतिवाद से ग़मगीन बताया है. साथ ही असम विधानसभा स्पीकर हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने एक स्पीकर के सवैंधानिक दायित्व के नाते प्रतिबद्धता की दुहाई देते हुए सौपे गए कर्तव्य और दायित्व के प्रतिपालन की बात भी कही है. 

लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करने के बाद असम में कई जगहों पर इस बिल के विरोध में छिटपुट हिंसा की घटनाएं घटी हैं और असम की राजधानी गुवाहाटी स्थित दिसपुर सचिवालय को असम जातीयतावादी संघठन और 40 अन्य संघटनो के कार्यकर्तआओं ने घेरने की कोशिश की. इस दौरान पुलिस और सैन्य बलों के साथ प्रदर्शनकारियों से धक्का मुक्की भी हुई. 

इस बिल के खिलाफ में असम गण परिषद् ने सोनोवाल सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी थी और आज शाम सोनोवाल सरकार में शामिल असम गण परिषद् के तीनो मंत्रियो ने अपना त्यागपत्र भी सौंप दिया है. राज्य में नागरिकगता संशोधन विधेयक का विरोध को देखते हुए असम विधानसभा अध्यक्ष क्षुब्ध बताए गए हैं. हालांकि स्पीकर पद पर आसीन और पद के गरिमा के खातिर उन्होंने सौपे हर सवैंधानिक दायित्व के प्रतिपालन के लिए बाध्य कहा है.  

असम में जिस प्रकार नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध हो रहा हैं उसे देखते हुए कयास ये लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में असम भाजपा के अन्य विधायक भी त्यागपत्र दे सकते हैं. पर सबसे दिलचस्प बात है कि सोनोवाल सरकार के सहयोगी दल बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के नेता हाग्रामा मोहिलारी ने अभी तक नागरिकता संशोधन विधेयक पर सोनोवाल सरकार की समर्थन और मोदी सरकार के पारित करने के निर्णय पर चुप्पी साधी हुई है. असम में बीजेपी 61 सीटों के साथ सहयोगी पार्टी बीपीएफ की 12 सीटों के साथ सत्ता में है. बहुमत के लिए 128 में से 65 सीट की जरूरत है. बीजेपी के पास 73 विधायकों का समर्थन है.

कल लोकसभा में विधेयक पारित होने पर भाजपा प्रवक्ता मेहदी आलम बोरा ने मंगलवार को पार्टी में सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था. यह विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया था. इस विधेयक के कानून बनने के बाद, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर और बिना उचित दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता मिल सकेगी. 

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