जम्मू कश्मीरप्रदेश

ये बच्‍चे दौड़ती रेलगाडि़यों पर चढ़कर जान जोखिम में डाल, पेट भरने को ऐसा करते हैं

पेट की आग बुझाने के लिए बड़े बुजुर्गो से लेकर बच्चों तक को भी अपनी जिंदगी दांव पर लगाना पड़ रही है। धूप हो या बारिश, जम्मू रेलवे स्टेशन पर दौड़ती रेलगाडि़यों पर चढ़कर कूड़ा बीनते बच्चे रोजाना देखे जा सकते हैं।

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जम्मू रेलवे स्टेशन पर सुबह से ही रेलगाडि़यों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसके बाद आठ से 15 वर्ष के बच्चे कंधे पर बड़ी सी बोरियां लेकर जम्मू रेलवे स्टेशन का रूख करते हैं।

बच्चे प्लेटफार्म और अधिकारियों के कार्यालयों के अलावा बाहरी राज्यों से आने वाली रेलगाडि़यों से प्लास्टिक की बोतलें व कबाड़ जो भी सामान मिलता है, उसे बोरी में भर लेते हैं।

 

दिनभर एकत्रित किए गए कबाड़ को शाम होते ही बेच देते हैं, जिससे वे अपने परिवार का पेट भरते हैं। बाहरी राज्यों से जम्मू आने वाली ट्रेनों पर यह बच्चे रेलवे स्टेशन के आउटर पर ही चढ़ जाते हैं। यदि रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर लग गई तो उसमें पड़े कबाड़ को उठाने वालों की संख्या बढ़ जाती है। इसलिए यह बच्चे चलती रेलगाडि़यों में चढ़ना पसंद करते हैं।

रेलवे स्टेशन के बाहर चलती रेलगाड़ी में जल्दी चढ़ने के चक्कर में यह बच्चे कई बार हादसे का शिकार भी हो जाते हैं। कई बार उन्हें अपनी जान से हाथ तक धोना पड़ता है। बच्चों को शोषण से बचाने के लिए शिक्षा के अधिकार जैसे कानून तो बनाए गए हैं, लेकिन जम्मू रेलवे स्टेशन पर कूड़ा बीनने वाले बच्चे अपने इस अधिकार से अंजान हैं।

 

स्टेशन की आसपास की बस्तियों में रहते हैं बच्चे रेलवे स्टेशन के आसपास के क्षेत्र में कई श्रमिक बस्तियां हैं, जिनमें मराठा बस्ती, बिहारी बस्ती और कुछ अन्य प्रवासी श्रमिकों की बस्तियां हैं। इन बस्तियों में रहने वालों की दिनचर्या रेलगाड़ी की आवाज से ही शुरू होती है। इनके परिवार का पालन पोषण रेलगाडि़यों से ही होता है।

रेलवे स्टेशन में कूड़ा बीनने वाले 12 वर्षीय गोलू का कहना है कि उनका परिवार उत्तर प्रदेश का रहने वाला है और काफी समय से वह जम्मू रेलवे स्टेशन के नजदीक रह रहे हैं। उसके पिता को शराब की लत लगी है तो घर खर्च चलाने के लिए उसे कूड़ा बीनने के लिए जम्मू रेलवे स्टेशन पर भेज दिया जाता है। औसतन वह कूड़ा बेचकर दिन में 40 से 50 रुपये कमा लेता है। एक प्लास्टिक की खाली बोतल बेचने पर उसे 50 पैसे मिलते हैं। घर पहुंचते ही अभिभावक यह रुपये ले लेते हैं।

 

कई बार रेलवे स्टेशन से खदेड़ा गया

रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के पोस्ट कमांडेंट जेके कुंडल का कहना है कि जम्मू रेलवे स्टेशन पर कई बार इन बच्चों को बाहर निकाला गया है, लेकिन मौका पाते ही ये स्टेशन के भीतर घुस आते हैं। बच्चों से बदसुलूकी सुरक्षाकर्मियों के लिए मुमकिन नहीं है। बच्चों के अभिभावकों को बुलाकर उन्हें सौंप दिया जाता है।

रेलवे की सुरक्षा पर लगते हैं प्रश्नचिन्ह

दो आतंकी हमले झेल चुके जम्मू रेलवे स्टेशन की सुरक्षा जवानों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि सुरक्षा को लेकर पुख्ता बंदोबस्त के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन यह बच्चे बेरोकटोक रेलवे स्टेशन परिसर में पहुंच जाते हैं और दिनभर वहीं खेलते कूदते और काम करते दिखाई देते हैं। आतंकी या शरारती तत्व कभी भी इन बच्चों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

 

हादसे : जून 2011 : कूड़ा बीनते रेलगाड़ी से कट कर 10 वर्षीय बच्चे की मौत हो गई थी। अप्रैल 2014 : रेलवे स्टेशन में 12 वर्षीय बच्चे का रेलगाड़ी से कट कर पांव कटा। 

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