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रक्त से जीवनदान: विश्व रक्तदाता दिवस पर विशेष

रक्तदान एक ऐसा दान होता है जिसमें आप यह नहीं जानते कि आप किसका जीवन बचा रहे हैं। ये न मजहब देखता है न जाति बस आपके दान को जरूरतमंद तक पहुंचा देता है। जब मकसद इतना लाजमी है तो सिर्फ पुरुष ही क्यों इसमें आगे रहे। जानकर हैरानी होगी लेकिन गत कुछ वर्षो में महिलाओं के रक्तदान करने की संख्या दो प्रतिशत से बढ़कर पाच प्रतिशत तक हुई है। ये मंजिल नहीं लेकिन सफर शुरू होने का इशारा जरूर है। मिलती है खुशी

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दीप्ति एमबीए स्टूडेंट हैं। बताती हैं कि पहली बार 18 साल की उम्र में रक्तदान किया था। पहले सिविल अस्पताल में डोनेशन के लिए गई थी, वहा मना हुआ तो लोहिया अस्पताल में गई। कहती हैं मुडो ब्लड डोनेशन करने से शाति मिलती है। जब भी मुडो बहुत ज्यादा तनाव होता है तो मैं ब्लड डोनेशन करती हूं। साल में दो बार मैं ब्लड डोनेट करती हूं। इसके लिए खुद की सेहत का खास ख्याल रखती हूं। मा और बेटी दोनों करती हैं रक्तदान

रीता मित्तल और उनकी बेटी ईशा मित्तल दोनों किसी मिसाल से कम नहीं। रीता मित्तल ने बताया कि वो गत कई वर्षो से रक्तदान करती हुई आईं हैं। यही बात अपनी बेटी को भी सिखाई। ईशा कहती हैं कि मैं पूरी कोशिश करती हूं कि साल में दो बार रक्तदान जरूर करूं। रक्तदान करने से मुडो बेहद खुशी मिलती है, इसके लिए मैं अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखती हूं। फल और जूस खाती हूं ताकि मेरा हीमोग्लोबिन ठीक रहे। हीमोग्लोबिन ठीक होते ही किया डोनेशन

सृष्टि दुबे ने दो साल पहले पहली बार ब्लड डोनेट किया था। कहती हैं कि तब तय किया कि हर साल ब्लड डोनेट जरूर करूंगी। इसके लिए हीमोग्लोबिन ठीक रहे, इसका पूरा ध्यान रखती हूं। कुछ ही समय पहले तबीयत बिगड़ी तो खुद को जल्दी ठीक करने की पूरी कोशिश की और हाल ही में दोबारा रक्तदान किया। कहती हैं कि मेरी ख्वाहिश है कि मैं अपनी कॉर्निया भी डोनेट करूंगी। घरवालों ने बढ़ाया हौसला

नवयुग कन्या महाविद्यालय की एनसीसी कैडेट निधि ने बताया कि एक साल पहले कॉलेज के ब्लड डोनेशन कैंप में ब्लड डोनेट किया था। कोई भी लड़की ब्लड डोनेट के लिए आगे नहीं आ रही थी। जिसके बाद मैंने ही आगे बढ़कर ब्लड डोनेट किया। मेरे ब्लड डोनेशन की बात सुनकर मम्मी-पापा बेहद खुश हुए थे उन्होंने कहा मेरी बहादुर बेटी है। अब तय किया है कि लगातार ब्लड डोनेट करूंगी और लोगों को जागरूक भी करूंगी। लोगों को कर रहीं प्रेरित

राजाजीपुरम की रहने वाली प्रियंका गुप्ता गत तीन वर्षो से रक्तदान कर रही हैं। प्रियंका ने बताया कि मुडो रक्तदान करने से खुशी मिलती है, साथ ही मैं अपने आस-पास रहने वाली महिलाओं को भी रक्तदान करने के लिए प्रेरित करती हूं और महिलाओं को उनके खान-पान का ध्यान रखने के लिए भी कहती हूं। यह भी जानें

शोधकर्ताओं केमतानुसार रक्तदान करने से दिल के दौरे की आशका कम हो जाती है। दिल की अन्य बीमारियों के होने की संभावना भी कम होती है क्योंकि रक्तदान करने से करने से हमारे खून में कोलेस्ट्रॉल जमा नहीं होता है। ब्लड डोनेट करने के कोई नुकसान नहीं होते हैं, बल्कि शरीर में नया ब्लड बनता है। ज्यादा बच्चों वाली महिलाएं न करें रक्तदान

जिन महिलाओं के एक से ज्यादा बच्चे हों उन्हें ब्लड डोनेशन नहीं करना चाहिए। जिन महिलाओं के एक से ज्यादा बच्चे होते हैं उनके ब्लड में मल्टी फेरिस की वजह से एंटी बॉडीज बनने लगती है। यह डब्ल्यूबीसी में रहती है, इस तरह की महिलाएं अगर ब्लड डोनेशन करती हैं तो ऐसे रक्त के उपयोग से मरीज को लंग इंजरी हो सकती है जो कि जानलेवा साबित हो सकती है। यह जानकारी केजीएमयू के ब्लड ट्रासफ्यूजन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो.तूलिका चंद्रा ने दी। प्रो.तूलिका ने बताया कि जिन महिलाओं के एक से ज्यादा बच्चे होते हैं उनकी प्लाज्मा में ल्यूकोसाइट की वजह से ‘ट्रॉली’ यानि ट्रासफ्यूजन रिलेटेड एक्यूट लंग इंजरी होने की आशका होने लगती है। ऐसे मरीजों को ब्लड चढ़ने से लंग इंजरी हो जाती है और यह जानलेवा साबित हो सकती है। महिला के ब्लड में एंटीबॉडीज बनने लगती है यह डब्ल्यूबीसी में रहती है। इस तरह का ब्लड अगर मरीज को चढ़ाया गया तो दो तीन दिन के अंदर बीमारी के लक्षण दिखने लगते हैं। इसमें मरीज को सास लेने में दिक्कत होने लगती है। 40 फीसद ब्लड ट्रासफ्यूजन स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में

प्रो.तूलिका चंद्रा ने बताया कि पूरे केजीएमयू में ट्रॉमा सेंटर के बाद सबसे ज्यादा लगभग 40 फीसद ब्लड सप्लाई स्त्री एवं प्रसूति विभाग क्वीनमेरी अस्पताल में होती है। यही नहीं लोहिया अस्पताल और डफरिन अस्पताल में भी सबसे ज्यादा ब्लड ट्रासफ्यूजन की जरूरत होती है। वहीं लगभग 60 फीसद गर्भवती एनिमिक होती हैं। ब्लड यूनिट की सप्लाई ठीक से मैनेज न होने पर मरीज की हो जाती है मौत

प्रो.तूलिका चंद्रा ने बताया कि अगर इस तरह के मरीज के शुरुआती लक्षणों को पहचान कर इलाज नहीं किया गया तो उसकी मौत हो सकती है। यह बीमारी मामूली से एक्सरे में दिखने लगता है। समय रहते मैनेज करने पर मरीज की जान बचाई जा सकती है। रक्तदान करने में रखें ध्यान

रक्तदान करने वाले व्यक्ति की उम्र 18 वर्ष से कम और 65 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।’ उसे टी.बी, डेंगू, मलेरिया, कार्डिएक अरेस्ट, किडनी रोगों और मिर्गी से पीड़ित, सिफलिस, गोनोरिया, एड्स, दमा और अन्य संक्त्रामक रोगों से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए।’ जो मधुमेह या सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हों या जिनका वजन तेजी से गिर रहा हो। अगर बड़ी सर्जरी हुई है तो छह महीने तक रक्तदान करने से बचें।’ दानकर्ता का हीमोग्लोबिन 12.5 ग्राम से ज्यादा होना चाहिए और कम से कम वजन 45 किलोग्राम होना चाहिए। गत वर्षो में रक्तदान करने वाली महिलाओं की संख्या हुई दो से पाच प्रतिशत ईशारीता गर्भवती महिलाएं न करें ब्लड डोनेट

प्रो.तूलिका चंद्रा ने बताया कि खुद वो 15 से ज्यादा बार रक्तदान कर चुकी हैं। गर्भवती महिलाएं ब्लड डोनेट नहीं कर सकती हैं वहीं डिलीवरी के बाद भी लगभग छह माह तक जब तक महिलाएं स्तनपान करवाती हैं तब तक उन्हें ब्लड डोनेट नहीं करना चाहिए। वैसे हर तीन माह पर ब्लड डोनेशन किया जा सकता है। सिजेरियन से लेकर कई तरह की जटिलताओं में ब्लड ट्रासफ्यूजन की जरूरत

लोहिया अस्पताल के ब्लड बैंक के प्रमुख डॉ.वीके शर्मा ने बताया कि महिलाएं अपना ध्यान नहीं रखती हैं। खान-पान और पौष्टिक आहार न लेने की वजह से अधिकतर महिलाएं एनिमिक रहती है। यही कारण है कि प्रेग्नेंसी में भी अधिकतर महिलाएं एनिमिक होती है। डिलीवरी के समय अगर किसी गर्भवती का हीमोग्लोबिन 12 से कम होता है तो उन्हें भी ब्लड ट्रासफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। यही नहीं कई बार डिलीवरी के बाद प्रसूताओं को पोस्ट पार्टम हैमरेज हो जाता है जिसकी वजह से उन्हें बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो जाती है। इसमें भी ब्लड ट्रासफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। वहीं कई बार नार्मल डिलीवरी में भी हीमोग्लोबिन कम होने पर ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

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