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शीतला सप्तमी व्रत आज माता की पूजा-आराधना से होते है रोग-दोष दूर

स्कंद पुराण के अनुसार मां शीतला दुर्गा और मां पार्वती का ही अवतार हैं. ये प्रकृति की उपचार शक्ति का प्रतीक हैं. इस दिन भक्त अपने बच्चों के साथ मां की पूजा आराधना करते हैं जिसके फलस्वरूप परिवार प्राकृतिक आपदा तथा आकस्मिक विपत्तियों से सुरक्षित रहता है.

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आदिकाल से ही श्रावण कृष्ण सप्तमी को महाशक्ति के अनंतरूपों में से प्रमुख शीतला माता की पूजा-आराधना की जाती रही है. आज शीतला सप्तमी व्रत है. मां शीतला की आराधना दैहिक तापों ज्वर,

राजयक्ष्मा, संक्रमण तथा अन्य विषाणुओं के दुष्प्रभावों से मुक्ति दिलाती हैं. कई विशेष प्रकार के रोगों से मां की आराधना मुक्त कर देती है. यही नहीं व्रती के कुल में भी यदि कोई इन रोगों से पीड़ित हो तो मां शीतलाजनित ये रोग-दोष दूर हो जाते हैं.

                                                        शीतला सप्तमी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में ब्राह्मण दंपति रहते थे. दंपति के दो बेटे और दो बहुएं थीं. दोनों बहुओं को लंबे समय के बाद बेटे हुए थे. इतने में शीतला सप्तमी (जहां अष्टमी को पर्व मनाया जाता है वे इसे अष्टमी पढ़ें) का पर्व आया. घर में पर्व के अनुसार ठंडा भोजन तैयार किया.

दोनों बहुओं के मन में विचार आया कि यदि हम ठंडा भोजन लेंगी तो बीमार होंगी,बेटे भी अभी छोटे हैं. इस कुविचार के कारण दोनों बहुओं ने तो पशुओं के दाने तैयार करने के बर्तन में गुप-चुप दो बाटी तैयार कर ली. सास-बहू शीतला की पूजा करके आई,शीतला माता की कथा सुनी.

बाद में सास तो शीतला माता के भजन करने के लिए बैठ गई. दोनों बहुएं बच्चे रोने का बहाना बनाकर घर आई. दाने के बरतन से गरम-गरम रोटला निकाले,चूरमा किया और पेटभर कर खा लिया.

सास ने घर आने पर बहुओं से भोजन करने के लिए कहा. बहुएं ठंडा भोजन करने का दिखावा करके घर काम में लग गई. सास ने कहा,”बच्चे कब के सोए हुए हैं,उन्हे जगाकर भोजन करा लो’..

बहुएं जैसे ही अपने-अपने बेंटों को जगाने गई तो उन्होंने उन्हें मृतप्रायः पाया. ऐसा बहुओं की करतूतों के फलस्वरुप शीतला माता के प्रकोप से हुआ था. बहुएं विवश हो गई.

सास ने घटना जानी तो बहुओं से झगडने लगी. सास बोली कि तुम दोनों ने अपने बेटों की बदौलत शीतला माता की अवहेलना की है इसलिए अपने घर से निकल जाओ और बेटों को जिन्दा-स्वस्थ लेकर ही घर में पैर रखना.

अपने मृत बेटों को टोकरे में सुलाकर दोनों बहुएं घर से निकल पड़ी. जाते-जाते रास्ते में एक जीर्ण वृक्ष आया. यह खेजडी का वृक्ष था. इसके नीचे ओरी शीतला दोनों बहनें बैठी थीं. दोनों के बालों में विपुल प्रमाण में जूं थीं.

बहुओं ने थकान का अनुभव भी किया था. दोनों बहुएं ओरी और शीतला के पास आकर बैठ गई. उन दोनों ने शीतला-ओरी के बालों से खूब सारी जूं निकाली. जूँओं का नाश होने से ओरी और शीतला ने अपने मस्तक में शीतलता का अनुभव किया. कहा,’तुम दोनों ने हमारे मस्तक को शीतल ठंडा किया है,वैसे ही तुम्हें पेट की शांति मिले.

दोनों बहुएं एक साथ बोली कि पेट का दिया हुआ ही लेकर हम मारी-मारी भटकती हैं,परंतु शीतला माता के दर्शन हुए नहीं है. शीतला माता ने कहा कि तुम दोनों पापिनी हो,दुष्ट हो,दूराचारिनी हो,तुम्हारा तो मुंह देखने भी योग्य नहीं है. शीतला सप्तमी के दिन ठंडा भोजन करने के बदले तुम दोनों ने गरम भोजन कर लिया था.

यह सुनते ही बहुओं ने शीतला माताजी को पहचान लिया. देवरानी-जेठानी ने दोनों माताओं का वंदन किया. गिड़गिड़ाते हुए कहा कि हम तो भोली-भाली हैं. अनजाने में गरम खा लिया था. आपके प्रभाव को हम जानती नहीं थीं. आप हम दोनों को क्षमा करें. पुनः ऐसा दुष्कृत्य हम कभी नहीं करेंगी.

उनके पश्चाताप भरे वचनों को सुनकर दोनों माताएं प्रसन्न हुईं. शीतला माता ने मृतक बालकों को जीवित कर दिया. बहुएं तब बच्चों के साथ लेकर आनंद से पुनः गांव लौट आई.

गांव के लोगों ने जाना कि दोनों बहुओं को शीतला माता के साक्षात दर्शन हुए थे. दोनों का धूम-धाम से स्वागत करके गांव प्रवेश करवाया. बहुओं ने कहा,’हम गांव में शीतला माता के मंदिर का निर्माण करवाएंगी.

चैत्र मही ने में शीतला सप्तमी के दिन मात्र ठंडा खाना ही खाएंगी. शीतला माता ने बहुओं पर जैसी अपनी दृष्टि की वैसी कृपा सब पर करें. श्री शीतला मां सदा हमें शांति,शीतलता तथा आरोग्य दें.

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानी, सब फल की दाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भाता।
ऋद्धि-सिद्धि चँवर ढुलावें, जगमग छवि छाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।
वेद पुराण वरणत, पार नहीं पाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

इन्द्र मृदङ्ग बजावत, चन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजावै, नारद मुनि गाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

घण्टा शङ्ख शहनाई, बाजै मन भाता।
करै भक्त जन आरती, लखि लखि हर्षाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

ब्रह्म रूप वरदानी तुही, तीन काल ज्ञाता।
भक्तन को सुख देती, मातु पिता भ्राता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

जो जन ध्यान लगावे, प्रेम शक्ति पाता।
सकल मनोरथ पावे, भवनिधि तर जाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

रोगों से जो पीड़ित कोई, शरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल काया, अन्ध नेत्र पाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

बांझ पुत्र को पावे, दारिद्र कट जाता।
ताको भजै जो नाहीं, सिर धुनि पछताता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

शीतल करती जननी, तू ही है जग त्राता।
उत्पत्ति बाला बिनाशन, तू सब की घाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

दास विचित्र कर जोड़े, सुन मेरी माता।
भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ भाता॥
॥ॐ जय शीतला माता…॥

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