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मुख्यमंत्री ने डॉ0 राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पांचवें दीक्षान्त समारोह को सम्बोधित किया

 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि विकसित भारत की नींव न्याय, अधिकार और कर्तव्य के सुदृढ़ ढांचे पर रखनी होगी। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प केवल सड़कों, कारखानों और एक्सप्रेसवे के निर्माण से पूरा नहीं होगा। वर्ष 2047 में भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होंगे। उस समय आज विधि की शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, अधिवक्ता समुदाय और विभिन्न संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे होंगे। इसलिए उन्हें अभी से स्वयं को इस ऐतिहासिक दायित्व के लिए तैयार करना होगा।


मुख्यमंत्री जी आज यहां डॉ0 राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पांचवें दीक्षान्त समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री जी ने विश्वविद्यालय के मेधावी विद्यार्थियां को मेडल तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किये। इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री विक्रम नाथ तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री अरुण भंसाली की भी उपस्थिति रही।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि यदि विकसित भारत-2047 के संकल्प को एक मुकदमे के रूप में देखा जाए, तो इस मुकदमे का विषय ‘विकसित भारत’, याची देश के 140 करोड़ नागरिक और उनकी ओर से पैरवी करने वाले आज के युवा विधिवेत्ता हैं। किसी मुकदमे में दावे को सिद्ध करने के लिए तथ्य, साक्ष्य, तर्क और ईमानदार अधिवक्ता की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए भी ठोस उपलब्धियों, प्रमाणों, तर्कों और ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता होगी।
इस मुकदमे का प्रतिवादी कोई व्यक्ति अथवा राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वह यथास्थितिवादी सोच है, जो यह मानकर चलती है कि परिवर्तन सम्भव नहीं है और किसी तर्क, तथ्य अथवा साक्ष्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती। युवा विधिवेत्ताओं को इस सोच के सामने अपने तर्कों और प्रमाणों के साथ मजबूती से खड़ा होना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सामान्यतः दीक्षान्त समारोहों में लम्बे और गम्भीर भाषण होते हैं, लेकिन आज वह विद्यार्थियों के जीवन, उनके करियर और विधि के क्षेत्र में उनकी आगामी भूमिका से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर बात करना चाहते हैं। केशवानन्द भारती से लेकर पुट्टस्वामी तक अनेक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रकरणों में जिन सिद्धान्तों और अधिकारों की चर्चा होती रही है, उन्हें समझना विधि के विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त आवश्यक है। दीक्षान्त समारोह केवल उपाधि प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि एक नई यात्रा का आरम्भ है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि कुलपति प्रो0 अमर पाल सिंह जी ने अपने दीक्षान्त उपदेश में कहा ‘सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ अर्थात सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो और स्वाध्याय में कभी प्रमाद अथवा आलस्य मत करो। किसी भी अधिवक्ता के लिए इससे अधिक संक्षिप्त और सार्थक कार्य-परिचय नहीं हो सकता। भारत की गुरुकुल और विश्वविद्यालय परम्परा में हजारों वर्षों से शिक्षा पूर्ण करने वाले विद्यार्थियों को यही सन्देश दिया जाता रहा है। विद्यार्थी आज नया गाउन पहनकर उपाधि प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उनके जीवन का मार्गदर्शन करने वाला यह दीक्षान्त उपदेश हजारों वर्ष पुराना है। शिक्षा पूरी होने पर गुरु अपने शिष्य को जीवन की आगामी यात्रा के लिए यही सीख देते थे कि सत्य का पालन करना है, धर्म के अनुरूप आचरण करना है और अध्ययन में कभी आलस्य नहीं करना है। इन सिद्धांतों को केवल चैम्बर की दीवार पर लिखने के बजाय अपने हृदय में उतारना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने विकसित भारत-2047 के मुकदमे की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी पहली महत्वपूर्ण तारीख 15 अगस्त, 1947 है, जब भारत स्वतन्त्र हुआ। स्वतन्त्रता संग्राम और संविधान निर्माण में योगदान देने वाले अनेक सेनानी विधिवेत्ता भी थे। डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद जी के नेतृत्व और अध्यक्षता में संविधान निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी, जिसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल जी, बाबा साहेब डॉ0 भीमराव आम्बेडकर जी सहित अनेक विधिवेत्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की शुरुआत थी, जिसकी शासन व्यवस्था, संस्थाएं और न्याय प्रणाली संविधान के अनुरूप संचालित हों। वर्ष 2047 में स्वतन्त्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर आज के युवा विधिवेत्ताओं को इसी राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी निभानी होगी।
इस मुकदमे की दूसरी महत्वपूर्ण तारीख 26 जनवरी, 1950 है, जब भारत का संविधान लागू हुआ। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारत का प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक शासक और प्रत्येक संस्था संविधान से बंधी है। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना को साकार करने वाला सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हमारा संविधान है। शासन, अधिकार, कर्तव्य और संस्थागत व्यवस्था का संचालन इसी के अनुरूप होना चाहिए। संविधान से इतर जाकर किसी व्यक्ति अथवा संस्था को कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। संविधान ही वह आधार है, जो राष्ट्र को एक सूत्र में बांधता है और सभी को कानून के दायरे में रखता है।
मुख्यमंत्री जी ने तीसरी महत्वपूर्ण तारीख 25 जून, 1975 का उल्लेख करते हुए आपातकाल के दौर को याद किया। उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय ने 12 जून को देश की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के चुनाव को निरस्त किया था और इसके ठीक 13 दिन बाद देश में आपातकाल लागू हुआ। उस समय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जस्टिस हंसराज खन्ना ने असहमति व्यक्त की और इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। लेकिन इतिहास व्यर्थ नहीं जाता। वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस हंसराज खन्ना की उस असहमति को सही माना। वर्ष 1975 ने देश को ‘रूल ऑफ लॉ’ और ‘रूलर का लॉ’ के बीच का अंतर समझाया। कानून का शासन सर्वोपरि होना चाहिए, न कि किसी शासक की इच्छा। न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति इसी में है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो और किसी भी परिस्थिति में न्याय के सिद्धांतों से समझौता न किया जाए।
मुख्यमंत्री जी ने वर्ष 2006 का उल्लेख करते हुए डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज जिस विश्वविद्यालय का पांचवां दीक्षांत समारोह आयोजित हो रहा है, उसका नाम डॉ0 राम मनोहर लोहिया के नाम पर है। डॉ0 लोहिया ने ‘राम, कृष्ण और शिव’ विषय पर अपने आलेख में भारत के तीन महान स्वप्नों का उल्लेख किया था। वे मंदिर नहीं जाते थे और किसी एक विशिष्ट उपासना पद्धति में विश्वास नहीं करते थे, लेकिन उन्होंने भारत की पूर्णता के तीन महान स्वप्न राम, कृष्ण और शिव को माना। उत्तर प्रदेश में रामायण मेलों की शुरुआत भी डॉ0 राम मनोहर लोहिया ने की थी।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि डॉ0 लोहिया के विचार आज भी जीवन और विधि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देते हैं। मस्तिष्क शिव जैसा होना चाहिए, जिनमें हिमालय की सर्वोच्च चोटी पर बैठकर साधना करने और श्मशान की राख ओढ़कर भी साधना करने की सामर्थ्य है। सम और विषम परिस्थितियों में विचलित हुए बिना निर्णय लेने की क्षमता शिव से प्रेरणा लेती है। हृदय कृष्ण जैसा होना चाहिए, जिनके मन में गरीब के प्रति भी संवेदना हो। कर्म और वचन की सामर्थ्य भगवान राम जैसी होनी चाहिए, जो मर्यादा का उल्लंघन न होने दें। प्रत्येक विधिवेत्ता में शिव जैसा मस्तिष्क, कृष्ण जैसा हृदय और राम जैसी कर्म तथा वचन की सामर्थ्य होनी चाहिए। इन गुणों को आत्मसात करने वाला व्यक्ति सही दिशा में आगे बढ़कर अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।
मुख्यमंत्री जी ने 16 मई, 2014 का उल्लेख करते हुए कहा कि 30 वर्ष के बाद देश में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और श्री नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री जी ने सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए कानून को बोझ के बजाय सुविधा का माध्यम बनाने का कार्य किया। अप्रासंगिक हो चुके 1,500 से अधिक कानून समाप्त किए गए। जन विश्वास अधिनियम के माध्यम से 42 कानूनों के 183 प्रावधानों में छोटी-छोटी चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता लागू हुई और ‘वन नेशन, वन टैक्स’ के रूप में जी0एस0टी0 आया। ‘एक देश में एक विधान, एक निशान और एक प्रधान’ की व्यवस्था को साकार करने की दिशा में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त किया गया, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी मुहर लगाई। नारी शक्ति वन्दन अधिनियम पारित हुआ।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सुधार का अर्थ केवल नए कानून बनाना नहीं है, बल्कि जिन पुराने कानूनों की सार्थकता समाप्त हो चुकी है, उन्हें हटाना भी सुधार की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा शुरू की गई इस सुधार प्रक्रिया के परिणाम आज देश के सामने हैं। वर्ष 2013 में दुनिया भारत को ‘फ्रेजाइल फाइव’ अर्थात पांच सबसे नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में गिनती थी। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता थी और निवेश की सुरक्षा पर भी सवाल उठते थे।
पिछले 12 वर्षों में भारत ने ‘फ्रेजाइल फाइव’ से निकलकर दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाया है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसने वैश्विक स्तर पर अपना विश्वास स्थापित किया है। किसी मुकदमे में जीत जितनी महत्वपूर्ण होती है, किसी देश और सरकार के लिए जनता तथा दुनिया का विश्वास जीतना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। जब भारत ‘फ्रेजाइल फाइव’ से ‘टॉप फाइव’ बन सकता है, तो विकसित भारत का संकल्प भी साकार किया जा सकता है। इसी विश्वास के साथ वर्ष 2047 के मुकदमे को आगे बढ़ाना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने उत्तर प्रदेश की स्थिति में आए परिवर्तन का उल्लेख करते हुए कहा कि आज से 10 वर्ष पहले प्रदेश में निवेश की बात करना भी लोगों को अविश्वसनीय लगता था। लोग कहते थे कि जहां व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है, वहां निवेश की सुरक्षा की बात कैसे हो सकती है;। जहां कनेक्टिविटी नहीं है, वहां निर्यात कैसे बढ़ेगा; जहां प्रभावी नीतियां नहीं हैं, वहां निवेशकों को प्रोत्साहन कैसे मिलेगा। वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ राज्यों की श्रेणी में रखा जाता था। संसद की विभिन्न बहसों में भी यह धारणा दिखाई देती थी कि सब कुछ सम्भव है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सुधार नहीं हो सकता। प्रदेश में परिवर्तन लाने के लिए यथास्थितिवादी सोच के सामने झुकने के बजाय दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कार्य किया गया।
मुख्यमंत्री जी ने स्वच्छ भारत अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जी ने 02 अक्टूबर, 2014 को अभियान की शुरुआत की और स्वयं झाड़ू उठाकर स्वच्छता का संदेश दिया। हर घर में शौचालय निर्माण का अभियान भी आगे बढ़ाया गया। इससे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच के कारण लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था और नारी गरिमा भी प्रभावित होती थी। उस समय सवाल उठाए जाते थे कि क्या हर घर में शौचालय बनाना और स्वच्छता का लक्ष्य प्राप्त करना सम्भव होगा। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 से पहले के ढाई वर्षों में स्वच्छता और शौचालय निर्माण के लक्ष्य की दिशा में अपेक्षित कार्य नहीं हुआ था।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें याद है कि तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री और बाद में देश के उपराष्ट्रपति बने श्री एम0 वेंकैया नायडू जी का फोन आया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश में शौचालय निर्माण की धीमी गति पर चिंता जताते हुए पूछा कि यह कार्य कब तक पूरा हो सकता है। मुख्यमंत्री जी ने उन्हें आश्वस्त किया कि 2 अक्टूबर, 2018 तक शौचालय निर्माण का कार्य पूरा करने का प्रयास किया जाएगा और जो थोड़ा-बहुत शेष रहेगा, उसे 26 जनवरी, 2019 तक पूरा कर लिया जाएगा। श्री नायडू जी ने इसके सत्यापन के लिए बाहर से थर्ड पार्टी नियुक्त करने की बात कही।
उत्तर प्रदेश में तीन करोड़ से अधिक घरों में शौचालयों का निर्माण कराया गया। 2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली में आयोजित समारोह में उत्तर प्रदेश का नाम सबसे पहले लिया गया और प्रदेश को स्वच्छता के क्षेत्र में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। उस समय सम्बन्धित केन्द्रीय मंत्री ने इसे चमत्कार बताया। यह चमत्कार नहीं, बल्कि लोगों के घरों में शौचालय बनवाने और निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने का परिणाम था। थर्ड पार्टी सत्यापन में भी निर्माण की पुष्टि हुई। यह अभियान नारी गरिमा की रक्षा और गम्भीर बीमारियों से मुक्ति के उद्देश्य से भी जुड़ा था।
मुख्यमंत्री जी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन्सेफेलाइटिस से होने वाली बच्चों की मौतों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह इस बीमारी के विरुद्ध सड़क से संसद तक संघर्ष करते रहे थे। विशेषज्ञों से जानकारी मिली कि शुद्ध पेयजल और स्वच्छता सुनिश्चित होने तथा खुले में शौच से मुक्ति मिलने पर इस बीमारी को समाप्त करने में बड़ी सहायता मिल सकती है। वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री जी ने बताया कि उत्तर प्रदेश ने इन्सेफेलाइटिस पर विजय प्राप्त कर ली है। पहले मध्य जुलाई से मध्य नवम्बर के बीच इस बीमारी से हर वर्ष 1,200 से 1,500 बच्चों की मौत होती थी और लोग असहाय बने रहते थे, जबकि अब इन्सेफेलाइटिस से होने वाली मौतों की संख्या शून्य हो गई है। परिवर्तन लाने के लिए जड़ता और यथास्थितिवादी सोच से बाहर निकलना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पहले ‘रूल ऑफ माफिया’ की स्थिति थी, जिसे समाप्त कर ‘रूल ऑफ लॉ’ की स्थापना की गई। प्रयागराज में एक माफिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह जिस जमीन पर पैर रख देता था, उसे अपनी मान लेता था और कानून उस पर प्रभावी नहीं होता था।
उत्तर प्रदेश अब ‘रूल ऑफ माफिया’ से मुक्त हुआ है और यहां वास्तविक अर्थों में कानून का शासन लागू हुआ है। इसी परिवर्तन के परिणामस्वरूप प्रदेश ‘बीमारू’ राज्य की श्रेणी से निकलकर भारत की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ है और राजस्व अधिशेष वाला राज्य बना है। अब उत्तर प्रदेश की उपलब्धियों पर पहले की तरह प्रश्न खड़े नहीं किए जा सकते। उन्होंने युवा विधिवेत्ताओं से इस व्यवस्था के सजग प्रहरी के रूप में कार्य करने का आह्वान किया।
कानून की सबसे बड़ी पूंजी उसकी धाराएं नहीं, बल्कि आमजन का विश्वास है। जब उत्तर प्रदेश ने निचले पांच राज्यों की स्थिति से निकलकर देश की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाया, तब आगे के लक्ष्य के रूप में एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का संकल्प सामने रखा गया। दस वर्ष पहले यदि उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही जाती, तो लोग इस पर हंसते। लेकिन आज इसके लिए विजन डॉक्यूमेंट तैयार किया गया है और उस पर चर्चा तथा कार्ययोजना आगे बढ़ चुकी है।
मुख्यमंत्री जी ने विश्वास व्यक्त किया कि उत्तर प्रदेश वर्ष 2029-30 में एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में सफल होगा। इस लक्ष्य के अनुरूप कार्ययोजना लागू की जा रही है और आवश्यक व्यवस्थाएं तैयार की गई हैं। निष्पक्षता, पीड़ित के प्रति सम्मान और युवा विधिवेत्ताओं का आचरण इस भरोसे को मजबूत करने की सीढ़ियां हैं। वह अक्सर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करते हैं, जिसका एक महत्वपूर्ण अर्थ है ‘जीरो एरर इन एविडेंस’-साक्ष्य में शून्य त्रुटि। न्याय व्यवस्था में साक्ष्य की शुद्धता और विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण है। विधि के क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मानक के अनुरूप अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
मुख्यमंत्री जी ने भारत की प्राचीन न्याय परम्परा और प्रमाणों के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि लगभग 2,000 वर्ष पहले महर्षि गौतम ने अपने न्याय सूत्र में चार प्रकार के प्रमाण बताए थे-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। प्रत्यक्ष प्रमाण, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और गवाही सहित न्याय की प्रक्रिया में प्रमाणों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। महर्षि गौतम के न्याय सूत्र में वर्णित ये सिद्धांत आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं। भारत की ज्ञान परम्परा में न्याय और प्रमाण के विषय में गहन चिंतन किया गया है, जिसे आज के विधि विद्यार्थियों को समझना और अपने कार्य में उपयोग करना चाहिए।
मुख्यमंत्री जी ने बृहदारण्यक उपनिषद का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म की शक्ति से ऊपर कुछ नहीं है। निर्बल व्यक्ति भी धर्म के सहारे बलवान के सामने खड़ा हो सकता है। हमारी उपनिषद परम्परा ने राजा को भी धर्म के अधीन रखा और यही ‘रूल ऑफ लॉ’ का मूल भाव है। इसी परम्परा से ‘सत्यमेव जयते’ का संदेश आया है। सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ भी यही बताता है कि जहां धर्म है, वहीं विजय है। न्यायपालिका ने यह नहीं कहा कि जहां बल है, वहां विजय है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों में मीमांसा की व्याख्याओं और सिद्धांतों का भी सहारा लिया है तथा अनेक प्रकरणों में उनका महत्व सामने आया है।
मुख्यमंत्री जी ने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि’ का उल्लेख करते हुए कहा कि गीता में अधिकार को कर्म से जोड़ा गया है, केवल अपने निजी हितों से नहीं। हमारा संविधान मौलिक अधिकार देता है, लेकिन अनुच्छेद 51(क) में मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख करता है और उनका स्मरण कराता है। अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं। हमें अपने कर्तव्यों को विस्मृत नहीं करना चाहिए।
विश्वविद्यालय के ध्येय वाक्य ‘धर्मसंस्थापनार्थाय’ का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ में वर्णित धर्म का अर्थ केवल किसी उपासना पद्धति से नहीं है। डॉ0 राम मनोहर लोहिया के विचारों की तरह यहां धर्म का सम्बन्ध कर्तव्य, सत्य और न्याय से है। इस युग में धर्म की स्थापना न्याय के माध्यम से होगी और न्याय की जिम्मेदारी विधिवेत्ताओं के हाथों में है। विद्यार्थी न्याय के उद्देश्य से यह डिग्री प्राप्त कर रहे हैं, इसलिए उन्हें अपने ज्ञान, आचरण और विवेक को इसी उद्देश्य के अनुरूप तैयार करना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने तकनीक और आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स (ए0आई0) से उत्पन्न नई सम्भावनाओं तथा चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक ने कार्यों को सरल बनाया है। पहले किसी शोध, गणना अथवा उसके परिणामों का अनुमान लगाने में वर्षों लग जाते थे, जबकि आज ए0आई0 के माध्यम से कुछ सप्ताह, दिनों या घण्टों में परिणामों का अनुमान लगाया जा सकता है। इससे कार्य आसान हुए हैं और अनेक समस्याओं के समाधान में सहायता मिली है, लेकिन तकनीक ने नई चुनौतियां भी पैदा की हैं।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज डीप फेक के माध्यम से किसी व्यक्ति का हूबहू चेहरा और आवाज प्रस्तुत की जा सकती है। यदि उसे वास्तविक प्रत्यक्ष प्रमाण मान लिया जाए, तो न्याय प्रक्रिया के सामने गम्भीर प्रश्न खड़े होंगे। इसी प्रकार किसी दूसरे देश में बैठा साइबर अपराधी किसी गरीब व्यक्ति की जीवनभर की कमाई एक झटके में उड़ा सकता है, जबकि उसकी पहचान और क्षेत्राधिकार का पता लगाना कठिन हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में प्रत्यक्ष प्रमाण की नई परिभाषा और साक्ष्य की विश्वसनीयता को समझने के लिए विधि के विद्यार्थियों को स्वयं को तैयार करना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 में केवल एक साइबर थाना था, जबकि अब सभी 75 जनपदों में साइबर थाने स्थापित किए गए हैं। प्रदेश के 1,583 थानों में साइबर हेल्प डेस्क भी स्थापित की गई हैं। उत्तर प्रदेश में फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट का गठन किया गया है, जो सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। ‘ए0आई0 प्रज्ञा’ के माध्यम से 10 लाख युवाओं को आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स, डेटा एनालिटिक्स और साइबर सिक्योरिटी में प्रशिक्षण देने की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है। तीन नए कानूनों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को मान्यता दी गई है और सात वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले मामलों में फॉरेन्सिक जांच अनिवार्य की गई है। न्याय व्यवस्था को बदलती तकनीक के अनुरूप तैयार करना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री जी ने ए0आई0 के सम्बन्ध में श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उदाहरण देते हुए कहा कि गीता में अर्जुन प्रश्न पूछते हैं और श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं। अठारहवें अध्याय में समस्त ज्ञान देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस पर पूरा विचार करो और फिर जैसा उचित समझो, वैसा करो-‘यथेच्छसि तथा कुरु’। अर्थात अंतिम निर्णय अर्जुन के विवेक पर छोड़ा जाता है। आज की तकनीकी भाषा में इसे ‘ह्यूमन इन द लूप’ कहा जा सकता है। मशीन सुझाव दे सकती है, लेकिन निर्णय मनुष्य को ही लेना होगा।
ए0आई0 को इतना अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह सुझाव देने के साथ-साथ अंतिम निर्णय भी स्वयं लेने लगे। ए0आई0 को सहायक बनाना चाहिए, सारथी नहीं, सारथी धर्म होना चाहिए। मशीन ड्राफ्ट तैयार कर सकती है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी सम्बन्धित व्यक्ति की होगी। किसी लापरवाह ड्राफ्ट की कीमत कोई निर्दोष व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता के वर्षों से चुका सकता है। यदि किसी व्यक्ति की आजादी बन्धक बनती है या उसे न्याय से वंचित किया जाता है, तो यह केवल टूल की गलती नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी भी है। कोड मशीन लिख सकती है, लेकिन ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ विधिवेत्ता को ही निभाना होगा। तकनीक का उपयोग कार्य को सरल बनाने के लिए होना चाहिए, न कि मानवीय विवेक और जिम्मेदारी को समाप्त करने के लिए।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विकसित भारत की अन्तिम कसौटी समाज के अन्तिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे ‘ग्राम स्वराज’ कहा और पं0 दीनदयाल उपाध्याय जी ने ‘अन्त्योदय’ का विचार दिया। विकास का वास्तविक आकलन सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि सबसे नीचे बैठे व्यक्ति की स्थिति से होना चाहिए।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विकसित भारत वही होगा, जहां हर चेहरे पर खुशहाली हो और अन्तिम व्यक्ति तक न्याय सहजता तथा सुलभता से पहुंचे। गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुःखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस व्यवस्था अथवा व्यक्ति के कारण आम आदमी दुःखी होता है, उसके लिए यह गम्भीर चेतावनी है। शासन, प्रशासन, न्यायपालिका और व्यवस्था के प्रत्येक हिस्से में आम नागरिक के प्रति संवेदना बनाए रखना आवश्यक है। अन्तिम पायदान पर बैठे व्यक्ति को बिना भेदभाव के सहज और सुलभ न्याय उपलब्ध कराने की गारन्टी ही विकसित भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में वास्तविक कदम होगी।
मुख्यमंत्री जी ने युवा विधिवेत्ताओं के सामने चार महत्वपूर्ण सुझाव रखे। पहला, ‘मेन कैरेक्टर’ बनिए। उन्होंने महाभारत के युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि कुरुक्षेत्र में अर्जुन सेना और अपने नातेदारों-रिश्तेदारों को देखकर हताश और निराश हो गए थे। उस समय श्रीकृष्ण ने उनकी दुर्बलताओं से ऊपर उठाकर उन्हें धर्म की स्थापना के लिए युद्ध करने और कमजोरी छोड़कर उठने का संदेश दिया। आज के युवाओं को भी ‘साइड कैरेक्टर’ बनकर नहीं रहना चाहिए। अन्याय सामने हो, तो चुप रहना किसी विधिवेत्ता के लिए विकल्प नहीं हो सकता।
दूसरा सुझाव ‘टच ग्रास’ अर्थात स्क्रीन से नजर हटाकर बाहरी दुनिया और अपनी जड़ों से जुड़ने का था। युवा अपने गांव की मिट्टी को भी छुएं और अपनी जड़ों को पहचानें। जिस पेड़ की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, वह उतना ऊंचा होता है और लम्बे समय तक अपनी यात्रा जारी रखता है। अपनी जड़ों को मजबूत रखने से भारत के लोकतंत्र की यात्रा भी मजबूत होगी। विधि के विद्यार्थियों से अपील की कि अवकाश के दिनों में भारत और दुनिया का भ्रमण करने के साथ-साथ वर्ष में कुछ दिन गांवों में जाकर वहां के छोटे-छोटे जमीन और पारिवारिक विवादों के समाधान में योगदान दें। गांवों में कई बार एक-दो फुट जमीन को लेकर विवाद खड़े हो जाते हैं और परिवारों के बीच छोटे विवाद बढ़कर भाई-भाई के झगड़े में बदल जाते हैं, क्योंकि लोगों को सही कानूनी जानकारी देने वाला कोई नहीं होता।
विधि के विद्यार्थी और युवा विधिवेत्ता गांवों में जाकर लोगों को ईमानदारी से समझा सकते हैं कि कौन-सा विवाद उचित है और कौन-सा उनके लिए भविष्य में संकट पैदा कर सकता है। कानून की जानकारी रखने वाले युवाओं पर ग्रामीणों को विश्वास होगा। दो, तीन, चार या पांच परिवारों के बीच संवाद स्थापित कराकर ऐसे विवादों का समाधान किया जा सकता है। इससे महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने में सहायता मिलेगी और युवा विधिवेत्ता समाज के लिए उपयोगी भूमिका निभा सकेंगे।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि तीसरा सुझाव अपने ‘ऑरा’ अर्थात अपनी साख और व्यक्तित्व की गरिमा को बचाकर रखने का है। करियर में ऐसे क्षण आएंगे, जब कोई व्यक्ति कहेगा कि थोड़ा-सा समझौता कर लीजिए, सब ऐसा ही करते हैं। विद्यार्थियों को ऐसे क्षण को ‘रेड फ्लैग’ मानना चाहिए। यहीं से शॉर्टकट की शुरुआत होती है और वर्षों में अर्जित प्रतिष्ठा एक क्षण में समाप्त हो सकती है। जब कोई गलत रास्ता अपनाने या शॉर्टकट लेने के लिए कहे, तो गहरी और लंबी सांस लेकर केवल इतना कहें-‘सत्यं वद’। सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए।
चौथा सुझाव हमेशा अपडेट रहना है। मोबाइल फोन का सॉफ्टवेयर हर महीने अपडेट होता है, उसी प्रकार कानून भी प्रत्येक निर्णय और संशोधन के साथ बदलता रहता है। विधि के विद्यार्थियों को स्क्रीन से लगातार जुड़े रहने के बजाय स्वाध्याय की आदत विकसित करनी चाहिए। ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ का अर्थ है कि अध्ययन में कभी आलस्य न किया जाए। नियमित अध्ययन, नए निर्णयों की जानकारी और कानून में होने वाले परिवर्तनों से अवगत रहकर ही विधिवेत्ता स्वयं को हर परिस्थिति के लिए तैयार रख सकते हैं।
मुख्यमंत्री जी ने अभिभावकों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि आज का दिन उनके लिए ‘कोर मेमोरी’ अर्थात जीवनभर याद रहने वाला क्षण है। बच्चों की उपाधि के पीछे अभिभावकों की वर्षों की साधना, त्याग, प्रार्थनाएं और जागी हुई रातें होती हैं। उन्होंने सर्दी, गर्मी और बरसात की परवाह किए बिना अपने बच्चों को सुरक्षित रखा, विषम परिस्थितियों में उनके साथ खड़े रहे और उनके सपनों को साकार करने के लिए निरन्तर प्रयास किया। आज प्राप्त होने वाली डिग्री और उपाधि उनके उसी त्याग और साधना का परिणाम है। इसलिए दीक्षान्त समारोह विद्यार्थियों के साथ-साथ उनके अभिभावकों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है।
सत्य को केवल अपने चैम्बर की दीवार पर लिखकर नहीं रखना है, बल्कि उसे अपने हृदय में उतारना है। हजारों वर्ष पहले हमारी ऋषि परम्परा ने ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ का संदेश दिया था। गीता के अन्त में अर्जुन कहते हैं-‘स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव’। इसका अर्थ है कि मैं सन्देह से मुक्त होकर खड़ा हूं और आपके वचन का पालन करूंगा। अर्जुन ने अपना दायित्व समझ लिया था और अब बारी आज के विद्यार्थियों की है। उन्हें भी अपने दायित्व को समझकर सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से कहा कि वे अपने हाथ में मिली डिग्री को ध्यान से देखें। यह केवल उनकी शैक्षणिक उपलब्धि का प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के विश्वास का वकालतनामा है। उन्हें इस विश्वास पर खरा उतरते हुए विकसित भारत-2047 के मुकदमे की पैरवी करनी है। जब भी कोई मुकदमा कठिन लगे या कोई निर्णय भारी प्रतीत हो, तो भारत के संविधान का स्मरण करना चाहिए। संविधान उनका मार्गदर्शन करेगा। विकसित भारत का संकल्प न्याय, सत्य, कर्तव्य और आमजन के विश्वास से ही साकार होगा। ’फैसला इतिहास सुनाएगा, पर बहस आपको करनी है।’
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री विक्रम नाथ ने कहा कि डिग्री प्राप्त करना इस यात्रा का अन्त नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरूआत है। शिक्षा की वास्तवित परीक्षा विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलने और दुनिया की जटिलताओं का सामना करने पर होती है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री अरुण भंसाली ने कहा कि दीक्षान्त समारोह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि अर्जित ज्ञान, स्वीकार की गई जिम्मेदारियों और समाज तथा संविधान के प्रति प्रत्येक विद्यार्थी के मौन संकल्प की अभिव्यक्ति है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 अमर पाल सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय अपने लगभग 20 वर्षां के कार्यकाल में विधि शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। पिछले दो दशकों में विश्वविद्यालय से शिक्ष प्राप्त कर 250 से अधिक विद्यार्थी उत्तर प्रदेश और देश की अन्य न्यायिक सेवाओं में न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्य कर रहे हैं।
इस अवसर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिगण, उच्च शिक्षा मंत्री श्री योगेन्द्र उपाध्याय, विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री केशव कुमार, छात्र-छात्राएं तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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