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ममता बनर्जी को केंद्र का कोई भी फैसला नही आ रहा है समझ मे, CAA के बाद अब NPR पर रार।

एनपीआर देश के सभी सामान्य निवासियों का दस्तावेज है और नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों के तहत स्थानीय, परगना, जिला, राज्य और देश स्तर पर इसे तैयार किया जाता है। कोई भी निवासी जो पिछले छह माह या उससे अधिक समय से स्थानीय क्षेत्र में निवास करता है या अगले छह माह तक वहां निवास करने की इच्छा रखता है उसे एनपीआर में अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होता है।

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नागरिकों की यह गिनती तो देश की व्यवस्था चलाने के लिए जरूरी भी है। इससे भविष्य की योजनाओं को क्रियान्वित करने में सहूलियत ही मिलनी है। इससे सबसे ज्यादा लाभ देश के गरीबों-वंचितों को मिलता है।

अब अप्रैल से सितंबर, 2020 के बीच देश भर में घरों की गिनती के दौरान एनपीआर के लिए डाटा भी एकत्रित किए जाएंगे, लेकिन ममता के विरोध के चलते बंगाल इससे अछूता रहेगा।

‘राज्य सरकारों को इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। किसी भी नागरिक को कोई दस्तावेज या जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।’ वहीं तृणमूल ने एनपीआर को लेकर साफ कहा है कि सरकार जनता को बेवकूफ बना रही है। क्योंकि एनआरसी से पहले का कदम एनपीआर है। ऐसे में रार होना तय है।

सीएए पर तो लगातार उन्होंने रैली और सभाएं की हैं। इसके लिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से जनमत संग्रह कराने तक की बेजा मांग कर डाली। वे सरकारी खर्चे पर नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विज्ञापन दे रही थीं।

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