मॉडल में बताया गया है कि स्टिकनी ज्वालामुखी के फटने के बाद बड़े-बड़े पत्थल लुढ़कने लगे

मॉडल में बताया गया है कि स्टिकनी ज्वालामुखी के फटने के बाद बड़े-बड़े पत्थल लुढ़कने लगे

मंगल के चंद्रमा फोबोस की सतह पर आड़ी-तिरछी नालियों के बनने के कारण का पता चलने का एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने दावा किया गया है। ब्राउन विश्वविद्यालय के इन शोधकर्ताओं का कहना है कि प्राचीन क्षुद्रग्रह में हुए विस्फोट के बाद निकले पत्थरों के लढ़कने से ये नालियां बनी थीं। जर्नल प्लैनेटरी एंड स्पेस साइंस में प्रकाशित इस अध्ययन में स्टिकनी ज्वालामुखी से उत्पन्न मलबे की नकल के लिए कंप्यूटर मॉडल का इस्तेमाल किया गया। मॉडल में बताया गया है कि स्टिकनी ज्वालामुखी के फटने के बाद बड़े-बड़े पत्थल लुढ़कने लगे। इस कारण फोबोस पर नालियां बन गईं जो आज भी देखी जा सकती हैं।

शोधकर्ताओं के टीम लीडर केन रैम्सले ने कहा कि फोबोस पर बनी ये नालियां उसकी एक विशिष्ट पहचान हैं और इसकी उत्पत्ति को लेकर 40 वर्षों से खगोलविद् लगातार बहस करते रहे हैं। रैम्सले का कहना है कि यह अध्ययन बहस को खत्म करने की दिशा में अहम साबित हो सकता है। फोबोस पर बनी नालियों को पहली बार 1970 में नासा के मैरिनर और विकिंग अभियान के दौरान देखा गया था।

उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में इसकी उत्पत्ति को लेकर कई बातें कही गईं। कुछ वैज्ञानिकों ने यह मान लिया है कि मंगल ग्रह पर किसी बड़े प्रभाव के कारण फोबोस पर मलबा जमा हुआ जो आज नाली के रूप में दिख रहा है। दूसरों का मानना है कि मंगल ग्रह की गुरुत्वाकर्षण शक्ति धीरे-धीरे फोबोस को अलग कर रही है। फोबोस की सतह पर नालियों का होना संरचनात्मक विफलता के लक्षण हैं।

19वीं सदी के सातवें दशक के उत्तराद्र्ध में खगोल वैज्ञानिक लियोनेल विल्सन और जिम हेड ने पहली बार यह बात कही कि स्टिकनी से निकलने वाले बड़े पत्थर नालियों का निर्माण करने में सक्षम हैं। रैम्सले ने बताया कि जिस प्रभाव के कारण इसका निर्माण हुआ है वह टनों भारी चट्टान को उड़ा सकता है। ऐसे में यह विचार व्यावहारिक लगता है।

शोधकर्ताओं ने यह देखने के लिए कंप्यूटर मॉडल तैयार किया कि क्या लुढ़कते पत्थरों की वजह से इस तरह की नालियों का निर्माण मुमकिन है। मॉडल स्टिकनी से निकले पत्थरों के रास्तों का अनुकरण करता है। साथ ही इसमें फोबोस के आकार, स्थलाकृति के साथ ही मंगल ग्रह के चारों ओर इसके गुरुत्वाकर्षण वातावरण, घूर्णन गति और कक्षा को भी ध्यान में रखा गया है।

मॉडल दिखाता है कि पत्थरों ने समानांतर रास्तों पर एक निर्धारित क्रम में लुढ़कना शुरू किया और इससे बनी नालियों के निशान फोबोस पर बने नालियों के जैसे ही हैं। इस तरह मॉडल से इन नालियों के निर्माण की गुत्थी सुलझ गई है।

मॉडल में यह भी दिखाया गया है कि फोबोस के छोटे आकार और अपेक्षाकृत कमजोर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण स्टिकनी के निकले पत्थर कुछ दूरी तय करने के बाद रुकने के बजाय लगातार लुढ़कते रहते हैं। इस कारण कुछ बड़े पत्थर पूरी सतह पर ही लुढ़कते रहे होंगे। फोबोस के पूर्वी गोलाद्र्ध से लुढ़कना शुरू करने वाले पत्थरों की वजह से बनी नालियां पश्चिमी गोलाद्र्ध तक पहुंचते-पहुंचते काफी बेतरतीब हो जाती हैं।  

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