धान की नर्सरी डालने का समय नजदीक-किसान करें खेतों की तैयारी, विशेषज्ञ ने दिए जरूरी सुझाव

मिल्कीपुर-अयोध्या। धान की खेती करने वाले किसानों के लिए नर्सरी डालने का समय नजदीक आ गया है। ऐसे में किसान खेतों की तैयारी और बीज चयन की प्रक्रिया में जुट गए हैं। तराई क्षेत्रों में धान की खेती करने वाले किसान विशेष रूप से नर्सरी तैयार करने की तैयारी कर रहे हैं। दीर्घकालीन धान की नर्सरी मई माह के अंतिम सप्ताह से शुरू हो जाती है, जबकि कई किसान 20 मई के आसपास ही इसकी तैयारियां शुरू कर देते हैं।
आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज के कृषि वैज्ञानिक एवं एग्रोनॉमी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एस.बी. सिंह ने किसानों को धान की नर्सरी तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने बताया कि किसानों को सबसे पहले अच्छे और गुणवत्तापूर्ण बीज का चयन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अल्पकालीन और दीर्घकालीन दोनों प्रकार की धान की प्रजातियां उपलब्ध हैं, लेकिन दीर्घकालीन धान की किस्मों में अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। इसका मुख्य कारण प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया का अधिक प्रभावी होना है। डॉ. सिंह ने बताया कि धान के बीज को पहले पानी में 24 घंटे तक भिगोकर रखना चाहिए। इसके बाद बीज को पानी से निकालकर किसी छायादार स्थान पर रख देना चाहिए। जब बीज अंकुरित हो जाए, तभी उसकी नर्सरी डालनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नर्सरी तैयार करने के लिए खेत की अच्छी तरह तैयारी करना जरूरी है। खेत में पहले पानी भरकर उसे ठंडा कर लेना चाहिए और फिर ट्रैक्टर से जुताई कर खेत को समतल बनाना चाहिए। उन्होंने बताया कि यदि 500 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में धान की नर्सरी तैयार करनी है तो उसमें लगभग 11 किलो यूरिया, अमोनियम सल्फेट अथवा 25 किलो सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करना चाहिए। इससे पौधों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है और पौधे मजबूत बनते हैं। रोग प्रबंधन को लेकर उन्होंने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि नर्सरी लगाने के लगभग 15 दिन बाद यदि झुलसा रोग के लक्षण दिखाई दें तो 5 किलो जिंक सल्फेट और 2.5 किलो चूना को 1000 लीटर पानी में घोलकर उसका छिड़काव करना चाहिए। इससे रोग नियंत्रण में मदद मिलती है। डॉ. सिंह ने बताया कि लगभग 25 से 30 दिन में धान की नर्सरी तैयार हो जाती है, जिसके बाद खेतों में उसकी रोपाई की जा सकती है। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर खेती करने की अपील की, ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके।



