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गोरखपुर में दो बच्‍चों ने हंसते-खेलते दी कोरोना वायारस को मात, अब RMRC करेगा इन पर शोध

कोरोना का वार बच्‍चों पर कमजोर साबित हुआ है। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के आगे यह वायरस टिक नहीं सका और संक्रमित बच्‍चे हंसते-खेलते ठीक हो गए। क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र (आरएमआरसी) गोरखपुर के प्रारंभिक अध्ययन में पता चला है कि 10 साल से कम उम्र के ब’चों में कोरोना की जटिलताएं नहीं आईं। इनके रिकवरी रेट को देखते हुए आरएमआरसी अब उनका ब्लड सैंपल लेकर शोध की तैयारी में है।

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बाबा राघवदास मेडिकल कालेज और ललित नारायण मिश्र रेलवे चिकित्सालय में दो माह के भीतर कोरोना वायरस से संक्रमित 15 बच्‍चे भर्ती किए गए। इनमें मई में एक, जून में 12 और जुलाई में अब तक भर्ती होने वाले दो बच्‍चे हैं। जुलाई में भर्ती होने वाले दोनों बच्‍चों का अभी रेलवे चिकित्सालय में इलाज चल रहा है। चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की उचित देखभाल और बच्‍चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता का ही नतीजा रहा कि इनमें से 13 बच्‍चों ने कोरोना को हरा दिया। बच्‍चों के तेजी से स्वस्थ्य होने और उनके रिकवरी रेट के बारे में पता चलने के बाद क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र ने इन बच्‍चों पर अध्ययन की तैयारी शुरू कर दी है।

अब तक युवा और बुजुर्ग ही अनुसंधान केंद्र के लिए शोध का विषय थे। अब तक हुए अध्ययन में यह बात साफ हो चुकी है कि कोरोना के संक्रमण से मुक्त होने वालों में ब’चे व युवा ज्यादा हैं। परेशानी उन्हीं के साथ हुई जिन्हें पहले से कोई बीमारी थी।

कोरोना संक्रमण के बावजूद बच्‍चों व युवाओं मेें कोई जटिलता नहीं आई। वे आसानी से इस संक्रमण से मुक्त हो गए। अभी तक युवाओं व बुजुर्गों पर ही शोध की तैयारी थी, जिनके ब्लड सैंपल भी लिए गए हैं। अब ब’चों के रिकवरी रेट को ध्यान में रखते हुए उनके भी नमूने लेकर शोध की तैयारी चल रही है।

डॉ. रजनीकांत, निदेशक, आरएमआरसी

गोरखपुर ने दिखाई कोविड-19 हेल्प डेस्क की राह

प्रदेश सरकार की ओर से पूरे प्रदेश में अनिवार्य तौर पर लागू किए जा चुके कोविड-19 हेल्प डेस्क की शुरुआत गोरखपुर से हुई थी। सरकार के निर्देश के पूर्व ही स्वास्थ्य महकमे ने रेलवे अस्पताल में कोविड-19 हेल्प डेस्क बना दिया था। कोरोना के नोडल अधिकारी व अपर गन्ना आयुक्त प्रमोद उपाध्याय ने दो जून को निरीक्षण के बाद इसकी प्रशंसा की थी और इस पहल से शासन को अवगत कराया था। इसके बाद इसे पूरे प्रदेश में लागू किया गया। जिलाधिकारी के. विजयेंद्र पाण्डियन ने भी निरीक्षण कर इस प्रयास को सराहा था। गोरखपुर के सरकारी अस्पतालों में कुल 510 कोविड-19 हेल्प डेस्क बनाए जा चुके हैं।

22 मई को स्थापित हुआ हेल्प डेस्क

22 मई को यह हेल्प डेस्क स्थापित हुआ। 23 मई को पहला कोरोना मरीज रेलवे अस्पताल में भर्ती हुआ था। बीआरडी मेडिकल कालेज, गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) स्थित क्वारंटाइन सेंटर, 100 बेड टीबी अस्पताल, एंबुलेंस सेवा, सीएमओ कार्यालय, सीएमओ कंट्रोल रूप से समन्वय स्थापित कर कोरोना मरीजों का सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित कराने में यह यह डेस्क अहम भूमिका निभा रहा है। कोविड हेल्प डेस्क पर पैरामेडिकल स्टॉफ के साथ पल्स ऑक्सीमीटर, इंफ्रारेड थर्मामीटर और सैनिटाइजर रखना अनिवार्य है।

कोरोना के नोडल अधिकारी ने शासन में गोरखपुर के कोविड-19 हेल्प डेस्क की रिपोर्ट दी थी। उनके दौरे के बाद 18 जून और 20 जून को शासन से आए दो अलग-अलग दिशा-निर्देशों के अनुसार पूरे प्रदेश के अस्पतालों में हेल्प डेस्क अनिवार्य कर दिया गया। – डॉ. नंद कुमार, अपर मुख्य चिकित्साधिकारी

कोविड-19 हेल्प डेस्क की पहल गोरखपुर ने की। इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसे पूरे प्रदेश में लागू किया गया। जनपद में 510 हेल्प डेस्क बनाए जा चुके हैं। सभी को दिशा-निर्देशों से अवगत कराया जा चुका है।

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