पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के अंतर्गत कोणार्क की मूर्तिकला एवं स्थापत्य पर व्याख्यान

प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री जयवीर सिंह की पहल पर आमजन मानस को कोणार्क की मूर्तिकला एवं स्थापत्य के बारे में शोधपरक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए आज पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के 11वें दिन डॉ. राजीव द्विवेदी, निदेशक, वृंदावन शोध संस्थान, मथुरा ने ‘कोणार्क की मूर्तिकला’ एवं ‘कोणार्क एक अधूरा स्थापत्य’ विषय पर दो ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किए।
यह जानकारी पुरातत्व निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी ने दी। उन्होंने बताया कि डॉ. द्विवेदी ने उड़ीसा की कलिंग स्थापत्य परंपरा की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि उड़ीसा की मूर्तिकला भारतीय कला परंपरा में अनुपम स्थान रखती है। उन्होंने मंदिर को मानव शरीर के रूपक के रूप में समझाते हुए उसके बाड़ा, गंडी और मस्तक आदि स्थापत्य अंगों की व्याख्या की।
कोणार्क की मूर्तिकला को उन्होंने पाँच प्रमुख वर्गों देवी-देवता, आकाशीय मंडल एवं खगोलीय विषय, पशु-पक्षी एवं जलीय जीव, पौराणिक तथा धर्मनिरपेक्ष/लौकिक जीवन में विभाजित कर समझाया। उन्होंने कहा कि इन मूर्तियों में तत्कालीन धार्मिक विश्वासों के साथ-साथ सामाजिक जीवन, नृत्य-संगीत, उत्सव, शिकार एवं दैनिक गतिविधियों का सजीव अंकन मिलता है।
उन्होंने बताया कि कोणार्क के स्थापत्य की चर्चा करते हुए उन्होंने विमान/देउल, जगमोहन, नटमंदिर एवं भोगमंडप की संरचना तथा रथाकार मंदिर की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मंदिर निर्माण में क्लोराइट, लेटराइट और खोंडालाइट जैसे पत्थरों का प्रयोग हुआ। उनके अनुसार ये पत्थर कोणार्क के आसपास उपलब्ध नहीं थे और निर्माण सामग्री को चन्द्रभागा नदी के जलमार्ग से लाए जाने की परंपरा रही होगी, जो तत्कालीन निर्माण तकनीक एवं परिवहन क्षमता को दर्शाती है।
कोणार्क के संरक्षण-इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने राजेंद्र नाथ मित्र के अध्ययन की चर्चा की और बताया कि 19वीं शताब्दी में उनके समय मुख्य मंदिर काफी हद तक ध्वस्त था तथा जगमोहन प्रमुख रूप से विद्यमान संरचना के रूप में शेष था। उन्होंने कोणार्क के खंडित स्वरूप को समझने के लिए स्थापत्य, मूर्तिकला एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के समग्र अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।
इस अवसर पर पुरातत्व विभाग की निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी जी ने डॉ. राजीव द्विवेदी का पौधा एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने उनके विद्वत्तापूर्ण एवं सरल प्रस्तुतीकरण की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे विशेषज्ञ व्याख्यान प्रतिभागियों में भारतीय कला, स्थापत्य एवं पुरातात्विक विरासत को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि विकसित करने में अत्यंत उपयोगी हैं।
कार्यक्रम का ऑनलाइन एवं ऑफलाइन संचालन श्री बलिहारी सेठ जी द्वारा किया गया। इसमें 100 प्रतिभागियों ने ऑफलाइन तथा 50 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन, कुल 150 प्रतिभागियों ने सहभागिता कर व्याख्यान से लाभ प्राप्त किया।
डॉ. द्विवेदी के व्याख्यानों ने प्रतिभागियों को कोणार्क की मूर्तिकला, स्थापत्य संरचना, निर्माण तकनीक तथा उसके ऐतिहासिक एवं संरक्षण संबंधी पक्षों को समग्र पुरातात्विक दृष्टि से समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया।



