
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी आज श्री काशी विश्वनाथ धाम, वाराणसी में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अन्तर्गत ज्योतिर्लिंग एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम ‘सोमनाथ संकल्प महोत्सव’ में सम्मिलत हुए। आयोजन में विभिन्न कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति की गई। इसके पूर्व, राज्यपाल जी एवं मुख्यमंत्री जी ने श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर में दर्शन-पूजन तथा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया। उन्होंने श्री काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के त्र्यंबकेश्वर हॉल में आयोजित श्री सोमनाथ संकल्प पूजन कार्यक्रम में प्रतिभाग किया। यहां उन्होंने बी0एच0यू0 के छात्रों द्वारा तैयार की गयी सोमनाथ की प्रतिकृति पार्थिव ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर जलाभिषेक और पूजन किया।
राज्यपाल जी एवं मुख्यमंत्री जी ने पुनर्निर्मित सोमनाथ मन्दिर के 75 वर्ष पूरे होने पर सोमनाथ मन्दिर, गुजरात में आयोजित सोमनाथ अमृत महोत्सव के अन्तर्गत प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा किये गये दर्शन-पूजन, कुम्भाभिषेक, ध्वजारोहण तथा सम्बोधन के सजीव प्रसारण का अवलोकन किया।
राज्यपाल जी ने आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि सोमनाथ मन्दिर राष्ट्र के स्वाभिमान का ज्योति-स्तम्भ है। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ हमें सोमनाथ मन्दिर की हजार वर्षों की दिव्य अविचलित यात्रा का स्मरण कराता है, जिसने अनेक आक्रमणों, संघर्षों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी आस्था, ऊर्जा और अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखा। उसी गौरवगाथा की श्रृंखला में, आज श्री काशी विश्वनाथ धाम में ज्योतिर्लिंग कार्यक्रम आयोजित हो रहा है।
राज्यपाल जी ने काशी और सोमनाथ को भारतीय सभ्यता के दो अमर स्वर बताते हुए कहा कि एक ने समुद्र की लहरों के मध्य आस्था का दीप जलाए रखा, तो वहीं दूसरे ने गंगा की अविरल धारा के साथ ज्ञान, मोक्ष और अध्यात्म का संदेश सम्पूर्ण विश्व को दिया। इतिहास ने अनेक बार सोमनाथ मन्दिर की दीवारों को तोड़ने का प्रयास किया, आक्रमणों ने इसके शिखरों को झुकाने का दुस्साहस किया, किन्तु हर बार सोमनाथ मन्दिर उसी तेज, दिव्यता और अदम्य आत्मविश्वास के साथ पुनः खड़ा हुआ।
राज्यपाल जी ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास पराजय का इतिहास नहीं है। यह इतिहास पुनर्जन्म का है। सोमनाथ मन्दिर हमें सिखाता है कि विनाश की आयु क्षणभंगुर होती है, पर सृजन सनातन होता है। जब कोई समाज अपनी आस्था से जुड़कर अपनी विरासत का सम्मान करता है, तभी उसकी सभ्यता दीर्घकाल तक जीवन्त और सशक्त बनी रहती है। आस्था समाज की सामूहिक चेतना का आधार होती है। हमारी परम्पराएँ, तीर्थ, स्मारक, लोक-कलाएँ, भाषाएँ और सांस्कृतिक मूल्य सभ्यता की जड़ें हैं, जिनसे हमारी पहचान निर्मित होती है। भारत की सभ्यता इसका सर्वात्तम उदाहरण है।
राज्यपाल जी ने कहा कि जिस राष्ट्र की जड़ें अपनी संस्कृति में गहरी होती हैं, उसकी उड़ान भी उतनी ही ऊँची होती है। आज भारत उसी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत सरकार द्वारा ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व अटूट आस्था के हजार वर्ष’ का विराट स्मरणोत्सव 11 जनवरी, 2026 से 11 जनवरी, 2027 तक वर्ष पर्यन्त देशभर में विविध आयोजनों, यात्राओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जा रहा है।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज द्वादश ज्योतिर्लिंग में से प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव मन्दिर की पुनर्स्थापना के अमृत पर्व तथा स्वाभिमान पर्व पर प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन सम्पूर्ण देश को प्राप्त हो रहा है। हम सभी एक भारत-श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को साकार होते हुए देख रहे हैं। सौराष्ट्र में श्री सोमनाथ महादेव मन्दिर की पुनर्प्रतिष्ठा व सुन्दरीकरण के कार्यक्रम के साथ ही काशी में श्री काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल में महालोक की स्थापना का कार्यक्रम, अयोध्याधाम में भगवान श्रीराम जन्मभूमि में श्रीरामलला मन्दिर निर्माण का कार्यक्रम सहित सनातन परम्परा से जुड़े हुए अनेक तीर्थस्थल अपने वैभव के साथ विकास की नई यात्रा के मार्ग पर बढ़ रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज का कार्यक्रम भारतीय सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक परम्परा तथा राष्ट्रीय आत्मगौरव के पुनर्जागरण का शंखनाद है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन हमें भारत की जड़ों से जोड़ने का अभिनव प्रयास है। श्री काशी विश्वनाथ धाम में यह कार्यक्रम भारत की सनातन परम्परा तथा सांस्कृतिक व आध्यात्मिक एकता का प्रतीक है। प्राचीन काल से ही हम सब उद्घोष करते रहे हैं ‘यतो धर्मस्यततो जयः’ अर्थात ‘जहां धर्म है, वहीं विजय है’।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि श्री काशी विश्वनाथ और श्री सोमनाथ भारत की सभ्यतागत चेतना के दो ज्योति स्तम्भ हैं। एक उत्तर में पवित्र माँ गंगा के तट पर बाबा विश्वनाथ धाम और दूसरा पश्चिमी भारत में सागर के तट पर स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ महादेव हैं। एक ओर गंगा तट पर स्थित काशी ने भारत की सनातन धारा को अक्षुण्ण रखा है, वहीं दूसरी ओर सोमनाथ ने समुद्र तट पर भारत के स्वाभिमान और पुनर्जागरण की लौ को हजारों वर्षां तक प्रज्ज्वलित रखा है। सोमनाथ मन्दिर भारत की सभ्यता के उस अमर आदर्श का प्रतीक है, जहां धर्म, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय अस्मिता एकात्म भाव से अभिव्यक्त होते हैं।
सोमनाथ और काशी इतिहास के माध्यम से हमें सन्देश देते है कि सनातन संस्कृति पर आक्रमण हो सकते हैं, लेकिन उसे पराजित नहीं किया जा सकता। विनाश क्षणिक होता है, जबकि सृजन शाश्वत होता है। 1,000 वर्ष पूर्व, विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने 17 बार आक्रमण कर सोमनाथ मन्दिर के वैभव को खण्डित करने का प्रयास किया। उसे भ्रम था कि वह मूर्ति खण्डित कर इसके वैभव को लूटकर भारत की आत्मा को सदैव के लिए समाप्त कर सकता है। यह सोमनाथ मन्दिर के साथ-साथ भारत के हजारों सनातन के प्रतीक पवित्र स्थलों के साथ हुआ। इनमें काशी विश्वनाथ धाम भी है। हम सभी जानते हैं कि मोहम्मद गौरी से लेकर मुगलों तक कई विदेशी आक्रांताओं ने हमारी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करने का प्रयास किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि औरंगजेब ने बाबा विश्वनाथ धाम के प्राचीन मन्दिर को ध्वस्त कर गुलामी का ढांचा खड़ा किया, लेकिन वह भारत की आत्मा को तोड़ नहीं पाया। विदेशी आक्रांता यह नहीं समझ पाये कि सनातन केवल मन्दिरों की दीवारों में नहीं, बल्कि भारत की चेतना में बसता है तथा भारत की चेतना आत्मा को अजर और अमर मानती है। भारत की अजरता व अमरता का यही शाश्वत शंखनाद यहां की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत में झलकता है। जिन लोगों ने सनातन को मिटाने का प्रयास किया, आज वह स्वयं मिट्टी में मिल चुके हैं। आक्रांताओं का अब कोई नाम लेने वाला नहीं, लेकिन श्री काशी विश्वनाथ धाम और सोमनाथ महादेव मन्दिर भारत के गौरव के प्रतीक बनकर स्वाभिमान की गाथा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि देश की आजादी के उपरान्त भारत की जनता के मन में एक आकांक्षा थी कि भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी स्वतंत्र हुआ है। इसका शंखनाद भारत की अखण्डता के शिल्पी लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया। उन्होंने समुद्र के तट पर सोमनाथ महादेव मन्दिर की पुनर्प्रतिष्ठा के कार्यक्रम के लिए संकल्प लिया था। उस संकल्प के अनुरूप उन्होंने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। अनेक विघ्नों, बाधाओं और चुनौतियों के बावजूद वह आगे बढ़े। सोमनाथ मन्दिर का पुनर्निर्माण दासत्व से मुक्ति और राष्ट्र की आत्मप्रतिष्ठा का उद्घोष था।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि काशी में श्री काशी विश्वनाथ धाम का दिव्य और भव्य स्वरूप हम सभी को देखने को मिल रहा है। सोमनाथ पुनः उसी तेजस्विता के साथ भारत के गौरव का उद्घोष कर रहा है। आज भी कई शक्तियां भारत के आत्म गौरव व स्वाभिमान के प्रतीक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों को स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ते हुए देखना नहीं चाहती। हम लोग जानते हैं कि कौन लोग श्री सोमनाथ मन्दिर के पुनर्प्रतिष्ठा कार्य में बाधक थे। इन्हीं तत्वों ने कालान्तर में राम मन्दिर के निर्माण में बाधाएं उत्पन्न करने का कार्य किया। स्वतंत्र भारत में एक अवसर था जब इन कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा सकता था, लेकिन भारत और भारतीयता, भारत की सनातन परम्परा, भारत के आत्मगौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के बारे में सोच का अभाव था।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज हम सभी प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन व नेतृत्व के परिणामस्वरूप सोमनाथ महादेव के स्वाभिमान पर्व के साथ ही मन्दिर की पुनर्प्रतिष्ठा के अमृत पर्व के साथ जुड़े हैं। श्री काशी विश्वनाथ धाम में हम सब इस कार्यक्रम के साक्षात दर्शन कर रहे हैं। हम सभी को आज से 75 वर्ष पूर्व पुनर्प्रतिष्ठा कार्यक्रम के अवसर पर प्रथम राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद के शब्दों का स्मरण करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि भौतिक वस्तुओं को कुछ समय के लिए क्षतिग्रस्त व विखण्डित किया जा सकता है। लेकिन आक्रांता यह भूल गये कि भारत के देव स्थल और यहां के आध्यात्मिक व सांस्कृतिक केन्द्र भारत की अजर, अमर और शाश्वत आत्मा के प्रतीक हैं। सोमनाथ पर्व भी उसी का प्रतीक है।
इस अवसर पर श्रम एवं सेवायोजन मंत्री श्री अनिल राजभर, स्टाम्प तथा न्यायालय शुल्क एवं पंजीयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री रवीन्द्र जायसवाल, आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, नवनियुक्त राज्यमंत्री श्री हंसराज विश्वकर्मा सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।



